Wednesday, May 2, 2018

यात्रा के रंग अनेक : गंगटोक से भारत-चीन सीमा की ओर

                                                                                - मिलन  सिन्हा
...गतांक से आगे ...  कहते हैं न कि ‘दिल है कि मानता नहीं’ या यूँ कहें कि यह दिल मांगे मोर. आखिर क्यों न मांगे ? सच तो यह है कि आपका, हमारा - सबका दिल कुछ और भी देखना चाहता है. दिल मांगे मोर.... तो हम सुबह-सुबह ही निकल पड़े एक बेहद रोमांचक यात्रा पर.

आज हमारे सारथी थे दिलीप, अपनी टाटा सूमो गाड़ी के साथ. गंगटोक में पले-बढ़े दिलीप अपने कॉलेज के दिनों और उसके बाद भी राजनीतिक कार्यकर्त्ता के रूप में काफी सक्रिय रहे. परिवार की जिम्मेदारी आने के बाद से वे इस काम में लगे हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से पूर्णतः जागरूक हैं. उनके पास सिक्किम के सभी बड़े राजनीतिक पार्टियों और उनके सभी बड़े नेताओं के कार्य-कलाप की अच्छी और ताजा जानकारी है. मुझे ये बातें दिलीप से चंद मिनट की बातचीत से पता चल गया. ऐसे अभी उसकी पत्नी एक बड़े पार्टी की सक्रिय मेम्बर है. दिलीप के साथ वार्तालाप से मुझे मोटे तौर पर सिक्किमवासियों के रहन-सहन, खान-पान आदि के बाबत भी काफी जानकारी मिली. मसलन, सामान्यतः आम सिक्किमवासी सफाई पसंद है, बेटा-बेटी में फर्क नहीं करते, बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक हैं, अधिकांश लोग मांसाहारी हैं, आदि. जानना दिलचस्प है कि 2011 के जनगणना के अनुसार सिक्किम में साक्षरता दर 82 प्रतिशत है, जो कि कर्नाटक, पश्चिम  बंगाल और तमिलनाडू से भी बेहतर है. उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, झाड़खंड और  बिहार से तो बहुत आगे है. सिक्किम देश का पहला राज्य है जो खुले में शौच से मुक्त बना. जैविक खेती करने के मामले में भी सिक्किम को देश का पहला राज्य बनने का गौरव प्राप्त है. 

गंगटोक से बाहर निकलते ही जवाहरलाल रोड पर हमें दो चेक पोस्ट पर रुकना पड़ा. सभी गाड़ियों को रुकना पड़ता है वहां.  उस रास्ते से भारत –चीन सीमा की ओर जानेवाले हर यात्री के पहचान पत्र और परमिट की पूरी जांच होती है –नियमपूर्वक बिना किसी भेदभाव के और बिना किसी लेनदेन के. गाड़ी के चालकों के लिए यह उनके रूटीन का हिस्सा है, लेकिन पर्यटकों के लिए एक नया अनुभव. हमारे गाड़ी के मालिक -सह-चालक दिलीप ने बताया कि जितनी गाड़ियां और जितने यात्री सुबह इधर से सीमा की ओर जाते हैं, वे सभी गाड़ियां एवं यात्री शाम को उधर से वापस आये कि नहीं इसका पूरा हिसाब रक्खा जाता है. कहीं  हेरफेर होने पर तुरत उसका संज्ञान लिया जाता है, त्वरित कार्रवाई की जाती है. हो भी क्यों नहीं, आखिर देश की सुरक्षा के साथ-साथ एक-एक यात्री की सुरक्षा-संरक्षा  का सवाल जो है.

  
सीमा सड़क संगठन (बॉर्डर रोड आर्गेनाईजेशन) के अंतर्गत आनेवाले  घुमावदार पहाड़ी सड़क पर अब हम धीरे धीरे भारत-चीन सीमा की ओर बढ़ रहे थे. इस स्थान को “नाथू ला पास” के रूप में जाना जाता है. गंगटोक से यहाँ की दूरी करीब 56 किलोमीटर है और समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग 14200 फीट है. बॉर्डर तक जाने के लिए यात्रा से एक दिन पहले सिक्किम सरकार से विशेष परमिट (पास) लेना अनिवार्य है. उधर जाने वाली प्रत्येक गाड़ी को भी परमिट लेना पड़ता है, बेशक गाड़ियां नाथू ला से पहले के एक-दो पर्यटक स्थान से होकर ही क्यों न लौट आये. परमिट बनवाने के लिए गंगटोक के प्रसिद्ध एम. जी. रोड पर स्थित सिक्किम टूरिज्म के ऑफिस या किसी भी अधिकृत टूर ऑपरेटर से संपर्क किया जा सकता है. हमारे ड्राईवर ने बताया कि हर दिन छोटी–बड़ी गाड़ियों का एक बड़ा काफिला, जिसकी संख्या स्थानीय प्रशासन द्वारा सुरक्षा सहित कई अन्य मामलों को ध्यान में रख कर तय किया जाता है, उस दिशा में जाता है. ऐसे, प्रशासन की यह कोशिश होती है कि ज्यादातर बड़ी गाड़ियां – सूमो, बोलेरो, स्कार्पियो आदि को तरजीह दी जाय जिससे कि ज्यादा लोग वहां तक जा सकें और वहां के सीमित पार्किंग स्पेस में गाड़ियों को पार्क किया जा सके; किसी भी तरह के जाम से बचा जा सके. 

जैसे –जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, हमें निरंतर एक पहाड़ी सड़क से अगले ऊंची सड़क पर पहुंचने का एहसास और रोमांच हो रहा था. दिलचस्प बात यह थी कि उल्टी दिशा से न के बराबर गाड़ी आ रही थी. कारण यह बताया गया कि सेना या प्रशासन की एक्का-दुक्का गाड़ियों को छोड़ कर सुबह के समय सभी गाड़ियां ऊपर की ओर जाती हैं और अपराह्न में वही गाड़ियां गंगटोक की ओर लौटती हैं. लिहाजा पहाड़ी सड़क में निरंतर घुमावदार रास्ते से चलने की बाध्यता के बावजूद भी गाड़ियां थोड़ी तेज ही चल रहीं थी. चालकों का दक्ष होना भी बड़ा कारण हो सकता है. रास्ते में हमें कहीं- कहीं सेना के पोस्ट एवं छावनी दिखाई पड़े. स्वभाविक रूप से वे इलाके ज्यादा साफ़ और व्यवस्थित लगे. 

पेड़-पौधों से आच्छादित ऊँचें-ऊँचे पहाड़ों के साथ और दूर ऊपर के रास्तों में आगे बढ़ते गाड़ियों की कतार को देख कर यह उम्मीद तो कायम थी कि हम आज “नाथू ला पास” और उसके नजदीक के अन्य दर्शनीय स्थानों का लुफ्त उठा पायेंगे. उस ऊंचाई पर पहाड़ों को हिमाच्छादित देखने का कौतुहल तो था ही. चालक ने बताया कि आज आगे ऊँचे  पहाड़ों पर हिमपात की संभावना है, कारण कल रात भी बारिश  हुई है और मौसम का मिजाज बता रहा है कि आगे हमें इसका आनंद लेने का मौका मिल जाएगा. ऐसे, अगर हिमपात होते हुए और पहाड़ों को बर्फ से ढंका देखने का अवसर मिल जाय, वह भी अप्रैल से सितम्बर के बीच तो समझिये आपका वहां जाना सफल हो गया, पैसा वसूल हो गया.

बहरहाल, नयनाभिराम प्राकृतिक दृश्यों का आनंद उठाते हुए हम आ पहुंचे गंगटोक से करीब 40 किलोमीटर की दूरी और करीब 7000 फीट ज्यादा ऊँचे स्थान पर अवस्थित  “सोमगो अर्थात छान्गू झील” के बिलकुल करीब. और अब हमें ऊँचें पहाड़ों पर यहां-वहां बर्फ के छोटे-छोटे चादर दिखने लगे. मन मचलने लगा ऐसे और भी दृश्य को आँखों और यादों में भरने को. 

यहाँ तक पहुंचने में हमें करीब तीन घंटे लगे. गत रात बारिश हुई थी, सो एक-दो जगह पर भू-स्खलन के कारण सड़क में अवरोध था जिसे ठीक करने में बॉर्डर रोड आर्गेनाईजेशन के कर्मी लगे हुए थे, फिर भी गाड़ियां धीरे –धीरे आगे बढ़ रही थी. हां, एक-दो बार गाड़ी थोड़ी देर के लिए रुकी जरुर. अच्छा ही हुआ. नीचे उतर कर चारों ओर देखने का एक मौका जो मिला. आगे –पीछे अनेक गाड़ियां थी, पर कोई हल्ला-गुल्ला नहीं था. ज्यादातर यात्री गाड़ियों  में ही बैठे थे. एक ओर ऊँचे पहाड़ और दूसरी ओर गहरी खाई. नजदीक से देखें तो चक्कर आ जाए. ड्राईवर ने दिखाया और बताया कि वह जो दूर ऊपर अलग-अलग ऊंचाई के सांपनुमा सड़क पर कई गाड़ियों के झुण्ड रेंगते दिख रहे हैं, उधर से ही हमें भी जाना है. सोचकर थोड़ा डर तो लगा, पर रोमांच की अनुभूति ज्यादा हुई.


यहाँ मतलब छान्गू झील के पास तक पहुंचने से कुछ देर पहले ही रिमझिम बारिश शुरू हो चुकी थी. लिहाजा ग्रीष्म काल में भी ठंढ का एह्साह होने लगा और स्वीटर के ऊपर गर्म जैकट भी चढ़ गया; कनटोप और मफलर भी निकल गया. ड्राईवर ने सिर्फ 10 मिनट का ब्रेक दिया जिससे कि लोग वाशरूम जा सकें; चाय-काफी पी सकें. ऐसा इसलिए कि हमारे मुख्य लक्ष्य अर्थात “नाथू ला पास”  तक जल्दी पहुंचना पहली प्राथमिकता थी, जो यहाँ से करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर है.  मौसम का कोई भरोसा जो नहीं था और बर्फ़बारी  भी शुरू हो चुकी थी. “नाथू ला पास” से लौटते वक्त छान्गू झील के पास ज्यादा देर तक रुकने का वादा ड्राईवर ने किया और गाड़ी आगे की ओर ले चला.

यहां यह जानना लाभदायक है कि “नाथू ला पास” जल्दी पहुंचने के फायदे भी कम नहीं. पहले तो गाड़ी पार्क करने में सुविधा, दूसरे वहां थोड़ा ज्यादा समय बिताने का अवसर, तीसरे शाम होने से पहले गंगटोक लौटने में आसानी और लौटते हुए बर्फ से आच्छादित कई स्थानों पर रुक कर फोटो खिचवाने का मौका. ऐसे हम भी समझ रहे थे कि सभी ड्राईवर ऐसी बातें करते हैं जिससे कि वे सीमित समय के भीतर यह टूर पूरा कर सकें. ऐसे इसमें गलत भी कुछ नहीं है. यात्री भी तो योजनानुसार टूर पूरा करना चाहते हैं, क्यों?

बहरहाल, चलते-चलते हम सोमगो अर्थात छान्गू झील के बारे में कुछ जान लेते हैं. यह स्थान समुद्र तल से 12300 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित है.  करीब एक किलोमीटर लम्बा  एवं लगभग 50 फीट गहरा  छान्गू झील चारों ओर से ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से घिरा हुआ है. ये पहाड़ साल में छः महीने से ज्यादा समय सफ़ेद बर्फ से आच्छादित रहते हैं. सोमगो का अर्थ होता है जल का स्रोत. पहाड़ों पर जमनेवाले बर्फ के पिघलने से इस झील  में पानी सालों भर रहता है. बेशक जाड़े के मौसम के अलावे भी तापमान ज्यादा गिर जाने से कई बार झील का पानी बर्फ से ढंक जाता है. ग्रीष्म एवं शरद काल में यहाँ कई तरह के मोहक फूल दिखाई पड़ते हैं, जो इस पूरे इलाके को और भी खूबसूरत बना देता है. शीतकाल में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों  को यहाँ देखा जा सकता है.

गाड़ी आगे बढ़ चली. पहाड़ों पर अब ज्यादा बर्फ दिखने लगे थे. आगे बीच-बीच में  यहां-वहां  सड़क मरम्मत का काम चल रहा था. बारिश के मौसम में पहाड़ी इलाकों में ऐसे दृश्य सामान्य हैं. आगे बढ़ने पर ड्राईवर ने बताया कि बस पास में ही है प्रसिद्ध बाबा मंदिर. लौटते वक्त यहां भी रुकेंगे, इस मंदिर को  देखेंगे. आइए, तब तक जान लेते है इस मंदिर के विषय में कुछ रोचक बातें. 


बाबा मंदिर “नाथू ला पास”  से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी  पर नाथू ला और जेलेप ला के बीच नाथू ला-गंगटोक मुख्य सड़क के निकट ही है. करीब 13,100 फीट की ऊंचाई पर स्थित  यह किसी देवी –देवता का मंदिर नहीं है. कहा जाता है कि बाबा मंदिर का निर्माण पंजाब  रेजीमेंट के एक जवान हरभजन सिंह की स्मृति में सेना के जवानों ने किया. बताया जाता है कि  वर्ष 1968  के जाड़े के मौसम में एक दिन कुछ पहाड़ी जानवरों को नदी पार करवाते समय एक हादसे में हरभजन सिंह नदी में डूब गए. साथी जवानों ने खोज की, पर वे मिले नहीं. फिर एक रात वे एक जवान के सपने में आये और बताया कि हादसे के बाद बर्फ में दब कर उनकी मौत हो गई है. दिलचस्प बात है कि सपने में बताये गए स्थान पर ही उनका शव मिला. सपने में ही साथी जवान से उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि उसी स्थान पर उनकी समाधि बनाई जाय. बाद में सेना के जवानों के द्वारा  उसी स्थान पर उनकी समाधि का निर्माण किया गया. बाबा मंदिर का निर्माण उसके कुछ अरसे बाद समाधि स्थल से थोड़ी दूर पर किया गया. स्वर्गीय हरभजन सिंह से जुड़ी कई बातें वहां के लोग अब तक रूचि लेकर साझा करते हैं.


आगे बढ़ने पर हमें मुख्य रास्ते के बिलकुल पास बैंक ऑफ़ इंडिया का एटीम दिखा -13200 फीट की ऊंचाई पर. बहुत अच्छा लगा. हमारे एक सह यात्री ने ड्राईवर से दो मिनट रुकने का अनुरोध किया. वे एटीम की ओर लपके और जल्द ही पेमेंट लेकर लौटे. वे बेहद खुश थे क्यों कि उन्हें पैसे की जरुरत थी, लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि इस स्थान पर एटीम होगा और बिना किसी दिक्कत के पेमेंट सुलभ होगा. थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर सड़क किनारे बॉर्डर रोड आर्गेनाईजेशन (बीआरओ) के एक हरे बोर्ड पर नजर पड़ी. लिखा था - “नाथू ला पास” तीन किलोमीटर दूर अर्थात अब हम अपनी मंजिल पर  पहुंचनेवाले थे. गाड़ी से उतरने से पहले ही ड्राईवर ने बताया कि  आगे बोर्ड पर जो कुछ लिखा है उसको फॉलो करना अनिवार्य है. इसके  मुताबिक़ आपको अपना कैमरा, मोबाइल फ़ोन आदि वहां नहीं ले जाना है अर्थात फोटो लेना वर्जित है. आप अगर बीपी, दमा आदि  के मरीज हैं तो डॉक्टर की सलाह से ही वहां जाएं, क्यों कि 14200 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस स्थान पर चारों ओर बर्फ ही बर्फ रहता है, और तापमान एवं ऑक्सीजन काफी कम.

“नाथू ला” कई मामलों में बहुत अहम है. आइये जानते हैं. 1950 में चीन द्वारा कब्ज़ा किये गए देश तिब्बत के दक्षिणी भाग में स्थित चुम्बी घाटी को भारत के सिक्किम प्रदेश से जोड़ने वाला स्थान “नाथू ला” है. यह हिमालय रेंज का पहाड़ी दर्रा है जिसके जरिए भारत  एवं चीन (चीन अधिकृत तिब्बत भी) के बीच अनेक वर्षों से व्यापार होते रहे. यह सिल्क रूट के नाम से जाना जाता रहा है. वर्ष 1958 में देश के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरु ने इस स्थान का दौरा किया. हाँ, 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार मार्ग करीब 44 वर्षों तक बंद रहा. 2006 में इसे फिर खोला गया. कहते हैं कि प्राचीन काल में भारत आनेवाले ज्यादातर तिब्बती एवं चीनी पर्यटक तथा व्यवसायी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते थे. एक बात और. कैलाश मानसरोवर तक जाने का यह ज्यादा सुगम मार्ग है, खासकर बुजुर्ग और बीमार तीर्थ यात्रियों के लिए, क्यों कि इस रास्ते यात्रियों  को कम समय लगता है और वे इस रास्ते मोटर गाड़ी से भी जा सकते हैं. वर्ष 2015 और 2016 में परम्परागत उत्तराखंड के लिपुलेख मार्ग के अलावे इस मार्ग का भी उपयोग किया गया. पिछले कुछ दिनों से भारत-चीन के बीच सीमा पर बढ़ते तनाव के मद्देनजर इस वर्ष (2017) तीर्थ यात्री नाथू ला होकर कैलाश मानसरोवर नहीं जा सके. आशा करनी चाहिए कि भविष्य में इस रास्ते को सामान्य आवागमन के लिए खोला जाएगा. 



तो अब गाड़ी से उतर कर हम चले वास्तविक भारत –चीन सीमा पर. इसके लिए सीढ़ियों से होकर ऊपर जाना पड़ता है. चूँकि रास्ते में जो हिमपात का सिलसिला शुरू हुआ था वह यहां पहुंचने पर और तेज हो गया था. सो, सीढ़ियां बर्फ से ढंक चुकी थी और  चलना  कठिन हो गया था. तेज हिमपात के कारण तापमान काफी गिर चुका था. ऑक्सीजन की कमी भी महसूस होने लगी थी. बावजूद इसके हमारा  हौसला बुलंद था. हम एक दूसरे का हाथ पकड़े धीरे –धीरे आगे बढ़ने लगे. बर्फ से ढंकी सीढ़ियों पर ऊपर की ओर जाने का यह अनुभव अपूर्व था. थोड़ा आगे बढ़ने  पर सेना के एक जवान ने हमें सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी कुछ हिदायतें दी और हमारी हौसला आफजाई भी की. हमें अच्छा लगा, उत्साह में इजाफा हो गया. घुमावदार  रास्ते से ऊपर जाना था. बच्चे और युवा तेजी से आगे बढ़ रहे थे. बुजुर्ग धीरे-धीरे और रुक-रुक कर. ऑक्सीजन की कमी से दम फूल रहा था. इस रास्ते चलते हुए बेनीपुरी जी की लिखी एक बात याद आ गई – जवानी की राह फिसलनभरी होती है. हालांकि यहां तो बर्फ के रास्ते  फिसलनभरे साबित हो रहे थे. नीचे बर्फ, निरंतर  हिमपात और ऊपर से बहती ठंढी हवा. कुल मिलाकर हाथ-पांव ही नहीं पूरा शरीर ठंड से ठिठुरने लगा. तभी दो कदम ऊपर एक छोटा- सा कमरा  दिखा जहां लोग अंदर-बाहर कर रहे थे. हम लपक कर उस कमरे के अंदर गए. आश्चर्य हुआ. वह एक छोटा रेस्टोरेंट था जहां चाय-कॉफ़ी के अलावे समोसा, बिस्कुट आदि भी बिक रहा था. देख कर हमें बहुत खुशी हुई. उस मौसम में उस ऊंचाई पर यह सब उपलब्ध होना आशातीत था. झट से कॉफ़ी का गर्म गिलास लिया और पहली चुस्की ली. कॉफ़ी अच्छी थी. बेशक स्वाद कुछ अलग सा लगा. पूछने पर पता चला कि यहां याक के दूध का ही प्रयोग होता है. रास्ते में कई स्थानों पर याक दिखाई तो पड़े थे, पर यह मालूम न था कि इस इलाके में याक के दूध ही बहुतायत में उपलब्ध हैं और सामान्यतः उसी का उपयोग किया जाता है. कहा जाता है कि शारीरिक तापमान एवं रक्तचाप को ठीक बनाए रखने में कॉफ़ी बहुत लाभदायक है. 

कॉफ़ी आदि लेने एवं वहां थोड़ी देर रुकने पर शरीर में उर्जा और उत्साह फिर से भर गया और हम निकल पड़े कठिनतर रास्ते से ऊपर पहुंचने को. निकलते ही रास्ते में उक्त रेस्टोरेंट के बगल में एक और कमरा दिखा जिसके बाहर चिकित्सा सुविधा कक्ष लिखा था. वहां सेना के मेडिकल स्टाफ ऑक्सीजन सिलिंडर एवं जरुरी दवाइयों के साथ मुस्तैद थे. हमें  बहुत सकून मिला; हम थोड़ा और आश्वस्त हुए. मन-ही-मन भारतीय सेना के जज्बे को सलाम करते हुए हम आगे बढ़ चले. आगे बढ़ने में दिक्कत तो हो रही थी, परन्तु ऊपर सीमा पर लहराता तिरंगा और उसकी आन-बान-शान को अक्षुण्य बनाये रखने को सर्वदा तत्पर एवं मुस्तैद भारतीय सेना के जवानों को  देखते तथा प्रेरित होते हुए आखिरकार हम पहुंच गए नाथू ला के भारत –चीन सीमा पोस्ट पर. हम सभी बहुत रोमांचित थे. आसपास सिर्फ बर्फ ही बर्फ. दूर जहां तक नजर गई, सभी पहाड़ बर्फ से आच्छादित थे. छोटे-छोटे सफ़ेद-भूरे बादल सर के ऊपर से आ-जा रहे थे. उनके लिए सीमा का बंधन जो नहीं था. इस अभूतपूर्व प्राकृतिक दृश्य के हम भी गवाह बन पाए, इसकी खुशी थी. 

14200 फीट ऊँचे बर्फ से ढंके पहाड़ पर कांटे तार की जाली से सीमा निर्धारित थी. इस पार  हमारे सैनिक गश्त लगा रहे थे तो उस पार चीनी सेना के जवान. वहां तैनात एक-दो जवानों से हमारी थोड़ी बातचीत हुई; देश को सुरक्षित रखने के लिए हमने उनके प्रति आभार व्यक्त किया और उन्हें शुभकामनाएं दी. सच मानिए, वहां खड़े होकर हमारे मन में न जाने कितने अच्छे ख्याल आ रहे थे. मसलन, दुनिया के छोटे-बड़े सभी  देश अगर एक दूसरे की भौगोलिक सीमा का पूरा सम्मान करे तो हर देश के रक्षा बजट में कितनी कमी आ जाय; उन पैसों का इस्तेमाल अगर गरीबी, बीमारी, भूखमारी आदि के उन्मूलन के लिए किया जाय तो विश्व के सारे देश मानव विकास सूचकांक में कितना आगे बढ़ जाएं.... ....

बहरहाल, यथार्थ  में लौटते हुए ध्यान आया कि हमारे गाड़ी के चालक ने घंटे भर के अन्दर लौट आने के लिए कहा था. तो हम लौटने के लिए तत्पर हुए. हिमाच्छादित पहाड़ से नीचे उतरना भी कम जोखिम भरा नहीं होता है. इस अनुभव से हम गुजर रहे थे. हमसे थोड़ा  आगे चलते एक युवा दंपति को अभी-अभी फिसलते एवं चोटिल होते देखा था. वो तो उनके साथ चलते लोगों ने उन्हें बीच में ही सम्हाल लिया, नहीं तो बड़ी क्षति हो सकती थी. खैर, साथी हाथ बढ़ाना की भावना को साकार करते हुए एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बहुत धीरे-धीरे हम नीचे तक सुरक्षित आ गए. हमारे सह-यात्री भी आ चुके थे. गाड़ी में बैठे तो शुरू हो गई बातें  सीमा पर  बिताये उन यादगार पलों की. 



ड्राईवर गाड़ी बढ़ा चुका था उल्टी दिशा में यानी गंगटोक की ओर. रास्ते में बाबा मंदिर और सोमगो अर्थात छान्गू झील पर भी तो हमें रुकना था. 

बस दस मिनट में हम आ गए बाबा मंदिर,  बीच में एक स्थान पर रुकते हुए. रुकने का सबब यह था कि सड़क के दोनों ओर पहाड़ की तलहटी तक बर्फ फैला था और हम सबों का मन बच्चों की तरह मचल रहा था, बर्फ से खेलने को; फोटो खिचवाने को. बर्फ की बहुत मोटी परत यहां से वहां सफ़ेद मोटे बिछावन की तरह बिछी हुई थी. अदभुत. 

चारों ओर बर्फ ही बर्फ. हिमपात जारी था, सो बहुत दूर तक साफ़ देखना कठिन हो रहा था. ठंढ भी उतनी ही. खैर, बच्चों और युवाओं ने तो बहुत धमाचौकड़ी और मस्ती की. बर्फ के बॉल बना-बनाकर एक-दूसरे पर निशाना साधा गया. कुछ लोग पहाड़ पर थोड़े ऊपर तक फिसलते हुए चढ़े भी. सेल्फी का दौर भी खूब चला. बड़े –बुजुर्गों ने भी बर्फ पर बैठकर-लेटकर उस पल का आनंद लिया और कुछ फोटो खिंचवाए, कुछ खींचे भी. तभी हमारी नजर भारत तिब्बत सीमा पुलिस के एक बोर्ड पर पड़ी. लिखा था, “ ताकत वतन की हमसे है, हिम्मत वतन की हमसे है....” सच ही लिखा है. ऐसे कठिन परिस्थिति में अहर्निश देश सेवा वाकई काबिले तारीफ़ है. 



इधर, सड़क किनारे खड़ी गाड़ी में बैठे ड्राईवर हॉर्न बजा-बजा कर हमें जल्दी लौटने का रिमाइंडर देते रहे. सो इन अप्रतिम दृश्यों को आँखों और कैमरे में समेटे हम लौट आये.  

बाबा मंदिर के पास पार्किंग स्थल पर बड़ी संख्या में सुस्ताते गाड़ियों को देखकर अंदाजा लग गया था कि मंदिर में काफी भीड़ होगी. अब हम मंदिर के बड़े से प्रांगण में आ गए थे. यहां तीन कमरों के समूह में बीच वाले हिस्से में बाबा हरभजन सिंह के मूर्ति स्थापित है और सामने दीवार पर उनका एक फोटो भी लगा है. बगल के एक कमरे में उनसे जुड़ी सामग्री मसलन उनकी वर्दी, कुरता, जूते, बिछावन आदि बहुत तरतीब से रखे गए हैं. पर्यटक और श्रद्धालु  उन्हें श्रद्धा  सुमन अर्पित कर निकल रहे थे. 

वहां से बाहर आते ही हमें सामने पहाड़ के बीचोबीच  शिव जी की एक बड़ी सी सफ़ेद मूर्ति दिखाई दी. दूर से भी बहुत आकर्षक लग रहा था. कुछ लोग पहाड़ी रास्ते से वहां भी पहुंच रहे थे. समयाभाव के कारण हम वहां न जा सके. हमें ड्राईवर दिलीप ने बताया कि सामान्यतः वैसे पर्यटक जिन्हें सिर्फ बाबा मंदिर तक आने का ही परमिट मिलता है, उनके पास थोड़ा ज्यादा वक्त होता है और उनमें से ही कुछ लोग ऊपर शिव जी की मूर्ति तक जाते हैं.

वहां से लौटते हुए भी कई स्थानों पर रुकने की इच्छा हो रही थी, लेकिन ड्राईवर ने यह कह कर मना  किया कि आगे सोमगो अर्थात छान्गू झील पर ज्यादा वक्त गुजारना  बेहतर होगा. सही कहा था उसने.  ऐसा सोमगो अर्थात छान्गू झील पहुंचने पर हमें लगने लगा.

ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच में मुख्य सड़क के बिलकुल बगल में है यह लम्बा खूबसूरत  झील. गाड़ी रुकते ही हम उतर कर झील के किनारे पहुंच गए. तुरत ही सामने से बड़ा- सा काला-सफ़ेद याक आ पहुंचा. याक की आंखें कुछ बोल रही थी, शायद यह कि यहां आये हैं तो मेरी सवारी का भी आनन्द ले लीजिए, अच्छा लगेगा आपको और मुझे भी. मेरा मालिक भी खुश होगा और आपके  जाने के बाद मुझे सहलायेगा, प्यार से खिलायेगा .... हमारे मालिक के लिए यह आमदनी का छोटा जरिया है, क्यों कि साल के कुछ ही महीने आप जैसे पर्यटक आ पाते हैं यहाँ... कहते हैं, बच्चे भगवान का रूप होते हैं, मन की बात खूब समझते हैं. याक भी कैसे अपनी भावना उनसे छुपा पाता. तो बच्चे याक की सवारी के लिए मचलने लगे. युवा और महिलायें भी साथ हो लिए. एक-एक कर सब सवारी का मजा ले रहे थे. फोटो सेशन भी हुआ. सेल्फी का दौर तो चलना ही था. बताते चलें कि याक के सींगों को कलात्मक ढंग से रंगीन कपड़ों से सजाया गया था. उसके पीठ पर रखा हुआ गद्दा भी सुन्दर लग रहा था.



दिन ढल रहा था, पहाड़ों पर फैले बर्फ की चादरों का रंग बदलता जा रहा था, गंगटोक लौटने वाली गाड़ियां लम्बी कतार में खड़ी थीं, ठंढ से ठिठुरते लोगों की भीड़ चाय-काफी की दुकानों में लगी थी, बच्चे दोबारा याक की सवारी की जिद कर रहे थे... सच कहें तो मनोरम दृश्य के बीच ये सारी बातें फील गुड, फील हैप्पी का एहसास करवा रही थी. अंधेरा होने से पहले गंगटोक पहुंचने की बाध्यता नहीं होती तो किसे लौटने की जल्दी होती ! खैर, गाड़ी में आ बैठे हम मन-ही-मन यह दोहराते हुए : जल्दी ही आऊंगा फिर एक बार, देखेंगे-सीखेंगे और भी बहुत कुछ, करेंगे हर किसी से बातें भी दो-चार... …                 ( hellomilansinha@gmail.com)                                                                                        फिर मिलेंगे, बातें करेंगे - खुले मन से ... ...
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित 

Thursday, April 19, 2018

MOTIVATION: YES, YOU TOO CAN REMAIN HEALTHY !

                                                                                                  - Milan K Sinha 

All of us are born to live and live healthy. Mahatma Gandhi rightly said, “It is health that is real wealth and not pieces of gold and silver.” Nevertheless, even those people who have materialistic security to a reasonable extent find it difficult to remain normally healthy and disease free. The health issues related to millions of have-nots, who still have many socio-economic problems despite our country being independent for more than seventy long years, are far bigger in any way.

In the course of interacting and discussing with various sets of people of all ages- youths, professionals, senior citizens etc.,  it has come to the fore distinctly that majority of people do not even know the proper way of drinking water. As a natural fall out, they are beset with one or the other ailments or physical problems and are compelled to visit the doctor and take medicines. In the process, they face avoidable inconveniences. It all happens when all of us have been drinking water since our very childhood. To put it plain, we are yet to know the art of drinking water- how much to drink, how to drink, when to drink and when not to.

Normally, we find people eating variety of eatables throughout the day that too under the influence of advertisements without thinking for even a moment before eating that the item is good or not good from health point of view. They are also unaware of the quantity of salt and sugar they are consuming by eating processed and packaged food items in large quantity regularly or in quicker intervals and also of the health hazard of excess consumption of salt or sugar.

The first hand experiences of this sort are many and are quite disturbing. To say the least, any amount of medical expenses by self and the government will be insufficient to do away with or drastically curb the incidence of frequent illness among large majority of our population. It is of course true for any country, but bigger the country, bigger is the problem until and unless we exactly know and be aware of the easy to practice remedies.

So, what exactly we should do to address this growing problem on a sustainable basis?

Here it is. The health experts across the world say that proper lifestyle gives us a blueprint for ensuring that our daily activities and choices keep us on our path of living healthy now and on days ahead.
So, sitting down to review our existing lifestyle discreetly and then deciding what lifestyle components are more important for us will help manage our health and thereby health of our family to a greater extent.

Undoubtedly, through better lifestyle management we become capable of knowing the ‘Dos’ and ‘Don’ts’ of a healthy living. To say, we become better equipped to practice desired level of physical activity, healthy eating, body weight management and stress management. This will also enable us to pursue our hobby in a better way and finally sleep well at night.


The end result would definitely ensure better health and productivity for all family members everywhere - workplace, examination centre, playground and home. The bonus will be reduced medical expenses and overall feel good feeling – the real win-win situation. 
           Will meet again with Open Mind. All The Best.
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Monday, March 5, 2018

यात्रा के रंग अनेक : गंगटोक शहर के आसपास

                                                                                                     -मिलन सिन्हा 

... गतांक से आगे ... ऐसे, आप गंगटोक तक आएं और उसके आसपास के दर्शनीय स्थानों को देखे बिना लौट जाएं, यह मुनासिब नहीं. वह भी तब जब कि इस शहर के आसपास के पर्यटक स्थलों को देखने के लिए आप अपने समय एवं बजट के हिसाब से पांच, सात या दस पॉइंट्स में से कोई भी ‘पैकज टूर’ चुन सकते हैं. इसमें पर्यटन सूचना केन्द्र एवं महात्मा गाँधी मार्ग  स्थित एकाधिक ट्रेवल एजेंसी आपके लिए मददगार साबित होंगे. सच कहें तो हमने इन्ही सूत्रों से पूछताछ करके पिछले दिन ही आज के घूमने के कुल दस स्थानों को तय कर लिया था. इसके बाद इन स्थानों पर जाने के लिए हमने एक छोटी गाड़ी भी दिनभर के लिए बुक कर ली. गाड़ी पहले बुक करना अच्छा रहता है, क्यों कि टूरिस्ट सीजन में कई बार आपको गाड़ी न मिलने के कारण अपना प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ जाता है. 

सुबह गाड़ी समय पर आ गयी. ड्राईवर ने मोबाइल पर सूचित किया. होटल से हम निकले तो बाहर झमाझम बारिश हो रही थी. पहाड़ों पर कब घटायें घिर आयें, बारिश होने लगे और कब अचानक धूप खिल उठे, अनुमान लगाना कठिन होता है, खासकर बाहर से आये लोगों के लिए. बहरहाल, कुछ मिनटों के बाद बारिश थमते ही हम चल पड़े गंगटोक शहर के आसपास स्थित दर्शनीय जगहों का आनंद उठाने. 

पहाड़ी जगह होने के कारण बारिश का पानी सड़क पर जमा होने की गुंजाइश कम थी. पुलिस मुख्यालय से पहले ही ड्राईवर ने एक ढलानवाली सड़क पर गाड़ी को मोड़ दिया. यह सड़क कम चौड़ी थी, फिर भी दोनों ओर से वाहनों का आना –जाना लगा था. अगल-बगल होटल एवं गेस्ट हाउस होने के कारण गाड़ियां सुस्त गति से चल रही थी. कुछ दूर आगे जाकर हमारी गाड़ी अचानक रुक गयी. सामने और भी गाड़ियां खड़ी थी. तभी ड्राईवर ने थोड़ी दूर पर सड़क के किनारे खड़े एक सज्जन को दिखा कर कहा, ‘सर देखिए, ये हैं सिक्किम के पूर्व चीफ मिनिस्टर श्री नरबहादुर भण्डारी’. कोट-पेंट-टाई पहने भण्डारी साहब एक आम शहरी के तरह खड़े थे और किसी को इशारे से बुला रहे थे. कोई तामझाम नहीं, कोई दिखावा नहीं, आसपास कोई सुरक्षा कर्मी भी नहीं. जब तक मै गाड़ी से निकलता और उनसे मिलकर कुछ बातें कर पाता, गाड़ी चल पड़ी. गाड़ी रोक कर बात करना संभव नहीं था, कारण पीछे भी गाड़ियां कतार से चल रही थीं. हां, गाड़ी तो चल रही थी, पर मैं मानसिक रूप से रुका हुआ था भण्डारी साहब के आसपास. बता दें कि नर बहादुर भण्डारी ने 1977 में सिक्किम जनता परिषद् का गठन किया और उसके संस्थापक के रूप में 1979 में चुनाव लड़ा. वे अक्टूबर 1979 से जून 1994 के बीच तीन बार सिक्किम के मुख्य मंत्री रहे और सिक्किम के लोगों के बीच काफी लोकप्रिय भी, बेशक उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. बहरहाल, चलती गाड़ी और चलती घड़ी ने हमें फ्लावर शो सेंटर पहुंचा दिया.


एक छोटे से स्थान में संचालित इस सेंटर में अनेक तरह के फूल खूबसूरत तरीके से प्रदर्शित किये गए हैं. रंग –बिरंगे फूलों के साथ अपने प्रियजनों का फोटो खींचने और फोटो खींचवाने में पर्यटकों की बड़ी भीड़ व्यस्त थी. दिन चढ़ते ही सैलानियों से भरी बसें आने लगी एवं यहाँ भीड़ बढ़ने लगी. बाहर निकला तो देखा खीरा बिक रहा है. पिताजी की बात याद आ गयी. वे कहा करते  थे कि सेहत के लिए सुबह का खीरा हीरा, रात का खीरा पीड़ा. बस, दो खीरा खरीदा और खाते-खिलाते हुए गाड़ी में बैठ गए. 

गाड़ी चली तो ड्राईवर ने बताया  कि वो सामने वर्तमान मुख्य मंत्री श्री पवन कुमार चामलिंग का सरकारी आवास है. श्री चामलिंग पिछले 23 वर्षों से सिक्किम के मुख्यमंत्री हैं.  अगर गाड़ी के चालक ने न बताया होता तो देख कर अनुमान लगाना मुश्किल था कि यह प्रदेश के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति का निवासस्थान है. कारण, न कोई आडम्बर, न बेरिकेडिंग  और न ही पुलिसिया तामझाम. आवागमन बिलकुल सामान्य. 


गाड़ी बढ़ चली अब अगले पॉइंट- हनुमान टोक यानी हनुमान मंदिर की ओर. गंगटोक शहर से करीब 10 किलोमीटर की दूरी एवं  समुद्र तल से करीब 7200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है यह खूबसूरत मंदिर. पार्किंग स्थल से मंदिर तक जाने के लिए सीढियां बनी है, जिसमें बीच-बीच में बैठने-सुस्ताने की व्यवस्था है. मंदिर के रास्ते में लगातार घंटियां लगी हैं, जिन्हें बजाते जाने पर ध्वनि की अदभुत गूंज-अनुगूंज से आप अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते. सारा परिसर इतना साफ़-सुथरा एवं सुरुचिपूर्ण ढंग से सुसज्जित है कि आप स्वतः पूछ बैठेंगे कि ऐसा रख-रखाव तो सेना के देखरेख में ही संभव है. बिलकुल ठीक सोचा है आपने. 



वर्ष 1968 से भारतीय सेना के माउंटेन डिवीज़न के जवान इस हनुमान मंदिर का रख-रखाव करते रहे हैं. इस स्थान से कंचनजंघा पर्वतमाला के अप्रतिम सौन्दर्य का आप आनन्द उठा सकते हैं. कहने की जरुरत नहीँ कि यहाँ आने पर आपको थोड़ा और रुकने का मन जरुर करेगा. लेकिन आगे और भी तो बहुत कुछ देखना है और घड़ी कहाँ तक आपको रुकने देगी. हाँ, एक और जानने योग्य बात. वर्षों से प्रचलित लोकमत के अनुसार राम-रावण युद्ध के दौरान आहत पड़े लक्ष्मण के लिए हिमालय से संजीवनी बुटी ले जाने के क्रम में हनुमान जी कुछ देर  के लिए इस स्थान पर रुके थे.

पेड़ों से भरे पहाड़ी रास्ते से होकर अब हम हनुमान टोक से करीब 1200 फीट नीचे गणेश टोक के पास आ गए हैं. घुमावदार सीढ़ियों से चढ़ कर इस मंदिर तक पहुँचते हुए आप प्रकृति के विविध रूपों का गवाह बनेंगे, साथ ही मौका मिलेगा गंगटोक शहर के एक  कुछ हिस्सों के विहंगम दृश्य से रूबरू होने का. इस गणेश मंदिर के पार्किंग स्थल के बिलकुल पास में आपको खाने-पीने की सामग्री मिल जायेगी और हस्तशिल्प की कुछ खूबसूरत वस्तुएं भी. कई सीनियर सिटीजन जो शारीरिक कारण से ऊपर मंदिर  तक नहीं जा पाते हैं, नीचे पार्किंग स्थल से भगवान गणेश को प्रणाम कर लेते हैं और ईश्वर का आशीर्वाद  पाने की अनुभूति से खुश हो जाते हैं. चाय-पानी और अन्य खरीदारी बाद में करते रहते हैं.


आप घूमने जाएं, वह भी घरवालों के साथ और फिर वहां कुछ खरीदारी न करें, यह नामुमकिन है. वह भी तब जब आप गंगटोक हस्तशिल्प एवं हैंडलूम प्रतिष्ठान में आ गए हों. यहाँ हैंडलूम के महिला कारीगरों को पूरी तन्मयता से काम करते हुए एवं कलात्मक चीजों का निर्माण करते हुए देख सकते हैं. देखने पर ही पता चलता है कि यह सब कितनी मेहनत एवं एकाग्रता की मांग करता है. इसके दूसरे हिस्से में एक तरफ हस्तशिल्प प्रदर्शनी लगी है तो दूसरे तरफ चीजें बिक्री के लिए उपलब्ध हैं. मेक इन इंडिया का अच्छा उदहारण. कलाप्रेमी एवं मानव श्रम को महत्व देने वाले लोगों के लिए यहाँ कुछ समय गुजारना एक अच्छा अनुभव साबित होगा. 

यहाँ से बनझकरी जलप्रपात, ताशी व्यू पॉइंट, एंची मठ एवं  लिंग्दुम मठ का भ्रमण करते हुए और बीच में मुसलाधार बारिश का लुफ्त उठाते हुए हम अब पहुंच गए हैं प्रसिद्ध बक्थांग वॉटरफॉल. यह खूबसूरत वॉटरफॉल वस्तुतः एकाधिक वाटर फॉल का एक समूह है. इस स्थान पर आप ‘रोप स्लाइडिंग’ का भी मजा ले सकते हैं. यहाँ सैलानियों की बहुत भीड़ होती है, कारण यह शहर के नजदीक है; मुख्य सड़क के बिलकुल पास अवस्थित है और बहुत आकर्षक भी है. सही है, पेड़ों से आच्छादित ऊँचे पहाड़ से एक साथ कई जल-प्रपात को नीचे आते देखना किसे विस्मत एवं मंत्र-मुग्ध नहीं करेगा. लिहाजा, यहाँ के प्राकृतिक दृश्यों को कैमरे में कैद करने में लोगों को मशगूल देखना बहुत ही स्वभाविक है. हाँ, कुछ राशि खर्च करके यहाँ आप सिक्किम के पारंपरिक लिबास में फोटो खिचवाने का आनंद उठा सकते हैं. बहरहाल, यहाँ से चलते वक्त स्वतः ही गुनगुना उठा मनोज कुमार एवं जया भादुड़ी अभिनीत चर्चित हिन्दी फिल्म ’शोर’ का वह कर्णप्रिय गाना – पानी रे पानी तेरा रंग कैसा....  

यहाँ से हम आगे बढ़े प्रसिद्ध नामग्याल इंस्टिट्यूट ऑफ़ तिब्ब्तोलाजी की ओर. यह स्थान  देवराली टैक्सी स्टैंड जो कि राष्ट्रीय उच्च मार्ग-31ए पर अवस्थित है, के निकट है. तिब्बती सभ्यता व संस्कृति का प्रमाणिक परिचय प्राप्त करना हो तो यहाँ आना सार्थक होगा. अपने स्थापना वर्ष 1958 से यह संस्था लगातार तिब्बत के लोगों के धर्म, भाषा, कला, इतिहास आदि से संबंधित अध्ययन तथा शोध-अनुसंधान में जुटा है. इसके पुस्तकालय एवं म्यूजियम  में तिब्बती जन-जीवन से जुड़ी तमाम कलाकृतियों और पुस्तकों-पांडुलिपियों का विराट संग्रह है. शायद यही कारण है कि बड़ी संख्या में शोधार्थी, विद्यार्थी एवं पर्यटक इस संस्थान में आते रहते हैं. 

सुबह से शाम तक के इस लोकल टूर का एक  दिलचस्प पहलू यह रहा कि हमें राजू नामक एक खुश-मिजाज ड्राईवर –सह-गाइड मिला, अन्यथा इन महत्वपूर्ण दस पॉइंट का भ्रमण शायद ही यादगार बन पाता. दरअसल, राजू एक पढ़ा-लिखा नौजवान है जिसकी रूचि हर सम-सामयिक विषयों में है. राजनीति से लेकर फिल्म तक उसकी एक समझ है जिसे व्यक्त  करने में उसे कोई झिझक नहीं, जैसा कि हम सामान्यतः अनेक संभ्रांत लोगों में पाते हैं. लिहाजा, जब राजू ने पूर्व मुख्यमंत्री की चर्चा की तो उसके साथ उनके समय की अच्छी-बुरी दोनों बातों का जिक्र किया, आम सिक्किमवासी  के आशा-आकंक्षा के बारे में बताया. गंगटोक में बेरोजगारी की स्थिति पर जब मैंने उसके विचार जानने चाहे तो बेशक राजू थोड़ा गुस्से में आ गया. उसने शिक्षित बेरोजगारों की बात की और कहा कि उनके लिए स्व-रोजगार के अलावे रोजगार के विकल्प बहुत ही सीमित हैं. स्व-रोजगार भी पर्यटन से जुड़ा है, लेकिन पर्यटन को एक उद्योग के रूप में विकसित करने में सरकार अबतक सफल नहीं हो पाई है. पर्वतीय पर्यटन का एक अलग  मिजाज होता है और एक सीमित अवधि. मसलन, गंगटोक में जाड़े के मौसम में पर्यटन से जुड़े सारे व्यवसाय बिलकुल सुस्त पड़ जाते हैं. नतीजतन, इन पर निर्भर एक बड़ी आबादी ठण्ड और बेरोजगारी के दोहरे मार को झेलने को मजबूर हो जाती है. एक और बात. यहाँ के युवा  सेना और अर्द्ध-सैनिक बलों में जाना चाहते  हैं, लेकिन वहां भी अनजाने कारणों से कुछ ही लोगों की बहाली हो पाती है. बड़े व्यवसाय में गैर-सिक्कमी लोगों, खासकर राजस्थानी, बंगाली एवं बिहारी लोगों के निरंतर बढ़ते वर्चस्व के प्रति भी उसने अपना रोष नहीं छिपाया. राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ाने में इन बाहरी लोगों की भूमिका को भी राजू ने रेखांकित किया. 

सूर्यास्त हो गया था. हम अपने होटल लौट आए. राजू से हाथ मिलाया, उसे थैंक्स कहा और उससे अगले दिन सुबह समय पर पहुंचने का आग्रह किया. वह हंसा और ओके कहकर बढ़ गया अपनी गाड़ी के साथ.


आपको जानकर अच्छा लगेगा कि गंगटोक के आसपास कई प्राचीन धार्मिक मठ हैं, जो पर्यटकों एवं अनुयायियों के आकर्षण के केन्द्र रहे हैं . लेकिन किसी कारण से आप इन सभी मठों का दर्शन न भी कर सकें तो कम-से-कम प्रसिद्ध रूमटेक मठ जरुर जाएं., क्यों कि यह सिक्किम का सबसे बड़ा और चर्चित मठ है. यह भी एक कारण था कि हमारे दूसरे दिन के कार्यक्रम में रूमटेक मठ देखना शामिल था, साथ ही  उसके आसपास के दर्शनीय स्थानों को देखना भी. ड्राईवर और गाइड राजू समय पर आ गया था. सो, सुबह–सुबह ही हम गंगटोक शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर अवस्थित इस मठ को देखने निकल पड़े. बताते चलें कि धर्मचक्र केन्द्र के रूप में विख्यात  रूमटेक मठ करीब 300 साल पुराना है और तिब्बती वास्तुकला की बेहतरीन मिसाल है. यह करमापा लामा का मुख्य कार्य स्थान रहा है. यह मठ समुद्र तल से 5800 फीट की ऊंचाई पर है. कहा जाता है कि यह मठ तिब्बत स्थित मूल तिब्बती बौद्ध मठ का प्रतिरूप है, जिसका पुनर्निर्माण  1960 के दशक में 16 वें करमापा द्वारा करवाया गया. 

पहाड़ी रास्ते से होते हुए हम करीब घंटे भर में रूमटेक मठ के मेन गेट के पास पहुंच गए. गाड़ी वहीं छोड़नी पड़ी. अन्दर जाने के लिए हम सबको अपना-अपना परिचय कार्ड दिखाना पड़ा, सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ा. पता चला कि सुरक्षा कारणों से यहाँ सुरक्षा कर्मी पूरे परिसर की चौबीसों घंटे कड़ी चौकसी करते हैं.  मेन गेट से थोड़ी चढ़ाई करते हुए और एक कतार में लगे प्रार्थना चक्रों ( प्रेयर व्हील्स ) को घुमाते हुए हम मठ के मुख्य द्वार पर पहुंच गए. वहां सुरक्षा कर्मी हर श्रद्धालु की जांच कर उन्हें मठ में प्रवेश की अनुमति दे रहे थे. अन्दर का माहौल भक्तिमय था और पूरा दृश्य अभिभूत कर रहा था. सुबह का समय होने के कारण हमें बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पूरे अनुष्ठानपूर्वक एवं परंपरागत तरीके से की जा रही प्रार्थना का गवाह बनने का सौभाग्य मिला. यह हमारे लिए एक अपूर्व अनुभव था. इस प्रार्थना में शामिल छोटे-बड़े करीब 30-35 भिक्षुओं  की तन्मयता और अनुशासन देखने लायक थी.  



प्रार्थना का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद हम परिसर के अन्य भागों को देखने चले. मठ के दाहिने हिस्से से हम पीछे की ओर गए जहाँ  ‘करमा श्री नालंदा इंस्टिट्यूट ऑफ़ हायर बुद्धिस्ट स्टडीज’ का खूबसूरत परिसर है. यह अनूठा शिक्षण संस्थान वाराणसी स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है और यहाँ युवा भिक्षुओं को बौद्ध दर्शन व इतिहास, तिब्बती साहित्य व कला के अलावे अंग्रेजी, हिन्दी, पाली, संस्कृत आदि भाषाओँ  की  शिक्षा दी जाती है. इस इंस्टिट्यूट में दुनिया भर से छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते हैं. अध्ययनरत सभी भिक्षु यहीं छात्रावास में रहते हैं.  इस परिसर के एक छोटे से हॉल में प्रसिद्ध स्वर्ण स्तूप भी है. कहा जाता है कि इसी स्थान पर 16 वें करमापा की पवित्र अस्थियां रक्खी गई हैं. 

परिसर में आते-जाते कई भिक्षुओं से हमें रोचक वार्तालाप का अवसर भी मिला. जानकारी मिली कि यहां से शिक्षित-प्रशिक्षित बौद्ध भिक्षु जीवनभर धार्मिक-सामाजिक-शैक्षणिक  कार्य में खुद को समर्पित कर देते हैं. सच मानिए, शहर के कोलाहल एवं प्रदूषण से परे पहाड़ पर बसे एवं मनोरम प्राकृतिक परिवेश में समर्पित धर्म गुरुओं एवं विद्वानों  से शिक्षित होना भिक्षुओं के लिए निश्चय ही सौभाग्य की बात है.

लौटने के क्रम में हमने मठ के निकट कुछ श्रद्धालुओं को शान्ति के प्रतीक ‘कबूतर’ को दाना खिलाते देखा. सैकड़ों की संख्या में कबूतरों को बेख़ौफ़ कई श्रद्धालुओं के हाथ से दाना चुगते देखा, शायद पास खड़े सुरक्षा कर्मी के कारण वे भी आश्वस्त थे, आशंका मुक्त थे. सचमुच, यह दृश्य हमें मंत्र-मुग्ध कर गया. इसी हर्षातिरेक में हम प्रार्थना चक्रों को घुमाते हुए रूमटेक मठ के गेट से बाहर आ गए.


हल्का नाश्ता करने के बाद हम नीचे उतरने लगे तो राजू ने बताया कि इसी रास्ते में थोड़ी  दूर पर विख्यात ‘जवाहरलाल नेहरु बोटानिकल  गार्डन’ है. जल्द ही हम वहां पहुंच गए. यह गार्डन एक बड़े से परिसर में है, जिसका देखरेख सरकार का वन विभाग करता है. इस परिसर का माहौल खुशनुमा है. यहां आप अनेक प्रकार के आर्किड का आनंद ले सकते हैं. ओक सहित अन्य अनेक दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधों के बीच वक्त कैसे गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता. 


रोचक तथ्य ये भी कि इतना पैदल चलने पर भी आप ज्यादा नहीं थकते, कारण रोजमर्रा की भागदौड़ की जिंदगी से इतर आपको प्रकृति के साथ वक्त गुजरना अच्छा लगता है और आप ऑक्सीजन अर्थात प्राण-वायु से भरे भी तो रहते हैं. 

आगे हमारी गाड़ी 'शान्ति व्यू पॉइंट' पर आ कर रुकी. इस स्थान से आप पूरे गंगटोक का एक बेहद खूबसूरत दृश्य देख सकते हैं. पहाड़ों के विस्तारित श्रृंखला में पूरे गंगटोक शहर और उसके आसपास फैले छोटे-बड़े इलाके का ऐसा विहंगम दृश्य शायद शान्ति व्यू पॉइंट  से ही शान्ति और सकून से आप देख सकते हैं. सच कहें तो आप चाय की चुस्की लेते हुए घंटों यहाँ समय बिता सकते हैं. सो, हमने भी थोड़ा ज्यादा समय इस जगह के नाम किया, बेशक बीच-बीच में राजू की  दिलचस्प आपबीती सुनते हुए. 

सचमुच, यात्रा हमें बहुत कुछ दिखाती है, बहुत कुछ सिखाती-समझाती है. तभी तो कई बड़े लोगों ने अलग-अलग तरीके से  कहा है : दुनिया एक बड़ी किताब है और वे जो यात्रा नहीं करते सिर्फ कुछ पेज पढ़ कर ही रह जाते हैं.

शाम हो चली थी. सड़क के दोनों ओर फैले प्रकृति के विभिन्न रूपों को निहारते हुए हम आ गए थे गंगटोक की ह्रदय स्थली महात्मा गांधी रोड के पास. हमने राजू से विदा ली, उसे गले लगाया, शुक्रिया कहा. राजू ने भी थैंक्स कहा और मुस्कुराते हुए बढ़ गया, कल फिर किसी और सैलानी को गंगटोक घुमाने की इच्छा के साथ – एक अच्छे गाइड की तरह. जीते रहो राजू....असीम शुभकामनाएं.       ....आगे जारी.                                                              (hellomilansinha@gmail.com)
                                  फिर मिलेंगे, बातें करेंगे - खुले मन से ... ...

# प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका "नई धारा" में प्रकाशित 

Tuesday, February 20, 2018

यात्रा के रंग अनेक : कोलकाता, सिलीगुड़ी और कलिंपोंग के रास्ते गंगटोक

                                                                              - मिलन सिन्हा
 
                                                                 
कहते हैं यात्रा में जाने का एक अलग रोमांच होता है; और यात्रा में जिज्ञासा का साथ हो, फिर तो अनेक अदभुत अनुभव व जानकारी हमें स्वतः मिलना लाजिमी है. चलते-चलाते हमें कितने ही ऐसे लोगों से मिलने का मौका मिलता है; प्रकृति के कितने ही  अनजाने, अप्रतिम रूपों से रूबरू होने का सौभाग्य मिलता है, इसका पूर्वानुमान शायद ही कोई लगा सकता है. लेकिन, न जाने क्यों और कैसे इस बार मेरे साथ यात्रा आरम्भ करने के साथ ही ये सब घटित होने लगा. निदा फाजली साहब ने यूँ ही तो नहीं लिखा :

धूप में निकलो, घटाओं में नहाकर देखो 
जिन्दगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो .

एक लम्बे अंतराल के पश्चात्  रात में ट्रेन से यात्रा का योग बना. 'क्रिया योग एक्सप्रेस' चल पड़ी नियत समय पर रांची से हावड़ा (कोलकाता) की ओर. आरक्षित डिब्बे में यात्री अपने–अपने बर्थ पर जमने लगे. हमारे डिब्बे में 30-40 वर्ष के लोगों का एक ग्रुप चल रहा  था, जिनमें से दो सदस्यों का बर्थ हमारे आसपास था. उनके दो और साथी आ गए और उनके बीच रांची प्रवास की चर्चा चल पड़ी. बातों से पता चला कि वे लोग, जिनमें कुछ महिलायें भी थी, एक सामाजिक समारोह में आये थे और अब कोलकाता लौट रहे थे. चर्चा के दौरान यह भी बात आई कि अगले कुछ दिनों में इस ग्रुप का रायपुर, गौहाटी आदि स्थानों में जाने का प्रोग्राम है. उनके बीच की प्रगाढ़ता और आसन्न प्रोग्राम के प्रति उनके उत्साह को देखते हुए उत्सुकतावश मैंने पूछा तो बगल में बैठे महेश जी ने बताया कि वे लोग राजस्थान के लक्ष्मणगढ़ के मूल निवासी हैं और अब कोलकाता में रहकर व्यवसाय आदि में सक्रिय हैं.  वे 'लक्ष्मणगढ़  नागरिक परिषद् ' के सक्रिय सदस्य है, जिसकी स्थापना 1987 में हुई और जिसका एक बड़ा मकसद लक्ष्मणगढ़ के प्रवासी लोगों को एक मंच पर लाना है तथा अपने सामाजिक कार्यों का विस्तार करना है. उन्होंने बताया कि उनके दो दिनों के प्रवास में उनको रांची में रहनेवाले करीब एक सौ परिवारों से जुड़ने का अवसर मिला. सच मानिए, उनसे बातचीत  करते हुए मुझे अच्छा लग रहा था, क्यों कि समाज  में एकजुटता और भाईचारे को बढ़ाने का उनके इस प्रयास से मैं प्रभावित था. 

ट्रेन रफ़्तार में थी. घड़ी की सुई भी अपने रफ़्तार पर. आसपास के लोग सोने लगे, एक –दो लोगों ने बत्ती  बुझाने का आग्रह भी किया. लिहाजा,  बातचीत को विराम लगा. 

सुबह आंख खुली तो ट्रेन तेज गति से गंतव्य की ओर भागी जा रही थी और पीछे छूटते जा रहे थे हरे–भरे गांव, जहां पानी की कोई किल्लत नहीं दिखी. दस-बीस घर के साथ एक पोखर दिख जाता और दिख जाते उनमें तैरते बत्तख; उसके किनारे कुछेक पेड़-पौधे. जल संचयन -संग्रहण एवं पर्यावरण को बेहतर बनाए रखने का कारगर पारम्परिक उपाय. जानकार कहते हैं कि पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में आपको आम तौर पर ऐसे दृश्य दिखेंगे. 

हावड़ा स्टेशन आने से पूर्व रेल पटरी के दोनों ओर  गन्दगी का दीदार करते हुए हम स्टेशन पर समय से पहुंच गए. हाँ, ट्रेन के एसी -3 बोगी के रख-रखाव में कुछेक कमियों के अलावे कोई बड़ी असुविधा नहीं हुई. हावड़ा स्टेशन के प्लेटफार्मों की मरम्मत की जरुरत महसूस हुई. हजारों यात्री रोज इन प्लेटफार्मों से होकर गुजरते हैं; छोटी परेशानी कब बड़ी दुर्धटना का सबब बन जाय, किसे पता. बहरहाल, वर्तमान रेल मंत्री के सत्प्रयासों का असर तो कई मामलों में दिखा, आगे और दिखेगा इसकी उम्मीद है. ऐसे भी, इतने सालों में लगे मजबूत जंग से जंग के स्तर पर निबटना पड़ेगा, मंत्री  जी. 

हावड़ा स्टेशन से बाहर निकलने पर देखा कि टैक्सी की प्री –पेड लाइन बहुत लम्बी थी, सुबह का वक्त जो था. ठहरने के स्थान पर जल्दी पहुंचने के दवाब में आरा (बिहार) निवासी  एक टैक्सी चालक की चालाकी का शिकार हुआ, जिसका सही –सही पता तब चला जब वह दोगुना किराया लेकर जा चुका था. दुःख कम था ये सोच कर कि चलो घी गिरा तो दाल में ही. नहीं समझे ? चलिए, कोई बात नहीं. हाँ, संतोष इस बात का था कि यादवपुर में रवि शंकर के आवास पर समय से ही पहुंच गया था, क्यों कि अगले दो घंटे में आगे की यात्रा के लिए कोलकाता एयरपोर्ट नियत समय से पहले पहुंचना था. जानकार कहते हैं कि कोलकाता में कब कहाँ जाम लग जाय, इसका पूर्वानुमान कोई नहीं लगा सकता. लिहाजा, थोड़ा फ्रेश होकर और रवि के परिवार वालों के साथ सुबह का क्वालिटी टाइम बिता कर निकल पड़ा एयरपोर्ट की ओर.


हाँ, अब भी टैक्सी के रूप में एम्बेसडर कार ही कोलकाता की पहचान है. पुरानी  डीजल एम्बेसडर गाड़ियाँ 30-35 किलोमीटर की रफ़्तार से  चली जा रही थी, भरपूर धुआं छोड़ते हुए. उमस, गर्मी एवं वायु प्रदूषण से हाल बेहाल था. आधुनिकता के जाने-पहचाने दुष्प्रभावों से यह महानगर भी जूझने को अभिशप्त. चौड़ी सड़क के दोनों ओर वही बेतरतीब कस्बानुमा रहन-सहन; बड़ी इमारत और झुग्गी झोपड़ी का साथ भी कहीं- कहीं. यह सब देखते –समझते आखिर पहुंच गए कोलकाता के नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर. यहाँ का नजारा बिलकुल ही अलग, शाइनिंग इंडिया....                                                                        

                                                                                                    
कोलकाता से करीब एक घंटे की हवाई यात्रा के बाद पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग सिलीगुड़ी के बागडोगरा एयरपोर्ट से बाहर निकला, तो बेहतर लगा –कारण उमस, गर्मी  और प्रदूषण कम था, कोलकाता की तुलना में. यहाँ का एयरपोर्ट छोटा है, लेकिन जानकार बताते हैं कि सैन्य दृष्टि से यह काफी महत्वपूर्ण है. हो भी क्यों नहीं. सिलीगुड़ी  उत्तर पूर्व का गेट-वे जो रहा है. लिहाजा, इस एयरपोर्ट का विस्तार करके इसे बड़ा बनाया जाना चाहिए, जिससे सैन्य सुरक्षा के अलावे पर्यटन और व्यवसाय में बेहतरी दर्ज हो और पश्चिम बंगाल के इस महत्वपूर्ण भाग के लोगों के साथ -साथ उत्तर –पूर्व के प्रदेशों के आम जन को भी इसका ज्यादा-से-ज्यादा लाभ मिल सके.


बागडोगरा एयरपोर्ट से निकलते ही दायीं ओर चाय बागान दिख गया और झट लगने लगा ऐसा कि चाय का कैफीन असर करने लगा, कारण मन –मानस उत्साह और उमंग से अनायास ही जैसे भरने लगा. हरियाली से मन प्रसन्न हो गया. चालक ने कार को चौड़े से बायपास रोड पर डाल दिया. कार की रफ़्तार तेज हो गयी. थोड़ी ही देर में शहर के  भीड़-भाड़, धूल व स्वभाविक रूप से जहाँ-तहां फैले गंदगी को पीछे छोड़ते हुए हम पहाड़  पर चढ़ने  लगे और साथ ही गर्मी के इस मौसम में धीरे –धीरे ठण्ड का सुखद अनुभव करने लगे. एक बात और. पहाड़ों के बीच से तेज रफ़्तार में  बहती-हंसती–कलकलाती प्रसिद्ध ‘तीस्ता’ नदी को उसके किनारे –किनारे चलती गाड़ी में से देखते जाना हमारे लिए एक अपूर्व अनुभव  था. 

शाम होने से पहले पं. बंगाल के एक दर्शनीय पर्वतीय स्थल ‘कलिंपोंग’ पहुंचना था. देर हो रही थी, क्यों कि पहाड़ी सड़क कई जगह ख़राब हालत में थे; धूल उड़ रहे थे. लगा ऐसा कि कई दिनों से ऐसा ही आलम था. कोई वैकल्पिक मार्ग शायद न हो, सो गाड़ियों को रुकते, रेंगते, धूल उड़ाते आगे बढ़ना था. यात्रा में ऐसे व्यवधान आनंद में खलल डालते तो हैं ही. हाँ, एक अनुरोध  ममता दीदी ( मुख्य मंत्री, पं .बंगाल) से. वे सड़क मार्ग से इस क्षेत्र का औचक दौरा-निरीक्षण करें. खुद देखेंगी, तो कुछ तो अच्छा हो ही जाएगा. क्यों ? बहरहाल हम सूर्यास्त से पहले कलिंपोंग पहुंच गए. इस बीच हाफ स्वेटर  निकल चुका था.


मुख्य चौक के बिलकुल पास ही रुकने की व्यवस्था थी. अभी अँधेरा नहीं हुआ था. जल्दी से सामान रखकर निकल आया बाहर. दूर –दूर तक पहाड़ और हरियाली. ठंडी हवा चल रही थी. चाय की तलब और फैलते अँधेरे ने बाजार की ओर रुख करने को कहा. बाजार छोटा-सा; सड़कें भी ज्यादा चौड़ी नहीं, लेकिन ट्रैफिक कमोबेश व्यवस्थित. स्थानीय लोगों ने बताया कि बाजार 8 बजे तक बंद हो जाता है. मोटे तौर पर खाने –पीने की सब चीजें उपलब्ध थी. मोमो, चाउमीन आदि लोगों की पसंद है, ऐसा पता चला. चलते -चलाते कुछ स्थानीय युवकों से बातचीत में पढ़े -लिखे युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या स्पष्ट रूप से उभर कर आई. 

कहा जाता है कि कलिंपोंग जो कि समुद्र तल से 4100 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित है, पहले भूटान साम्राज्य का हिस्सा था जो 1865 में ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आ गया. यहाँ के सदाबहार मौसम और आसपास के मोहक परिवेश को ध्यान में रख कर अच्छी संख्या में अंग्रेज यहाँ आकर रहने लगे. लिहाजा,  ब्रिटिश प्रशासन ने यहाँ कई अच्छे स्कूल  खुलवाये जिनमें से कुछ अच्छे स्कूल अब भी मौजूद हैं. इन स्कूलों में अब तो अन्य शहरों के बच्चे भी अच्छी संख्या में पढ़ते हैं. यहाँ अनेक आर्किड गार्डन और फूलों के नर्सरी हैं, जहाँ सैकड़ों प्रकार के फूल के पौधे हैं. कहना न होगा, यहाँ बड़े पैमाने पर विभिन्न प्रकार के फूलों का उत्पादन होता है. कलिंपोंग के पूर्व और पश्चिम भाग में बंटे दर्शनीय स्थलों (साईट सीइंग पाइंट्स ) में मोनेस्ट्री, मंदिर, पार्क, हेरिटेज बिल्डिंग  आदि भी शामिल हैं. यहाँ से दार्जीलिंग और गंगटोक दोनों ही दर्शनीय स्थानों तक करीब तीन घंटे में पहुंचा जा सकता है.

यात्रा की थोड़ी थकान तो थी और ठण्ड भी. जल्दी सो गया. सुबह आँख खुली तो खिड़की से बाहर देखा. झमाझम बारिश हो रही थी. सड़कों पर इक्का-दुक्का लोग आ–जा रहे थे. धीरे –धीरे चहल-पहल बढ़ी – स्कूल जाते बच्चों के साथ. बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन छोटी –बड़ी छतरी में अकेले या अभिभावक के साथ बच्चे मस्ती करते हुए स्कूल जा रहे थे, बारिश से बेपरवाह, जैसे यह उनकी रोजमर्रा की जिन्दगी का खुशनुमा हिस्सा हो. एक क्षण के लिए अपने बचपन के दिन याद आ गए, अनायास ही गुनगुना उठा : बचपन के दिन भी क्या दिन थे ...... कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन ....   

उसी मनःस्थिति में कुछ पल बीते. फिर एक सवाल सामने आया कि क्या कोई आपका बचपन लौटा सकता है या बीते हुए वे अच्छे दिन. शायद नहीं. हाँ, अगर हम खुद यह तय कर लें कि वर्तमान को खूब एन्जॉय करेंगे, तो हम उन बीते हुए पलों को किसी न किसी रूप में थोड़ा–बहुत तो जी ही लेंगे, क्यों ? तो फिर हम भी इसी भाव का दामन थामे निकल पड़े उसी बारिश में स्थानीय दर्शनीय स्थलों का आनंद लेने.

झमाझम  बारिश के बीच पहाड़ी सड़कों पर  गाड़ी का  अपनी रफ़्तार में आगे बढ़ना जोखिम भरा तो था, लेकिन ड्राईवर बड़े  आत्मविश्वास से गाड़ी चला रहा था और आगे छोटे –बड़े पर्वतों के बीच तैरते सफ़ेद-काले बादलों को देखने का रोमांच भी कम नहीं था. ऐसे ही नजारों को देखते-निहारते हुए हम पहुंच गए प्रसिद्ध डेलो हिल्स और डेलो लेक . यह कलिंपोंग के उत्तर-पूर्व  में 5590 फीट की ऊंचाई पर  स्थित है, जो कलिंपोंग शहर का सबसे ऊँचा स्पॉट है. इस पर्वत पर अवस्थित गार्डन –पार्क बहुत ही खूबसूरत है. हम जब वहां पहुंचे, बादल के छोटे टुकड़े इधर से उधर आ–जा रहे थे; रिमझिम बारिश हो रही थी जो वहां के वातावरण को और भी आकर्षक बना रहा था. कहते है कि मुख्यतः डेलो लेक से कलिंपोंग शहर को जल आपूर्ति की जाती है. 


वहां से लौटते हुए साइंस सेंटर, हनुमान पार्क और कुछ अन्य दर्शनीय स्पॉट होते हुए हम केशिंग के रास्ते बढ़ चले सिक्किम की राजधानी गंगटोक की ओर. यह पर्वतीय रास्ता वहां के गांवों से होते हुए सिलीगुड़ी –गंगटोक मुख्य मार्ग पर रंगपो से थोड़ा  पहले जाकर मिलता है. फलतः हमें वहां के गांवों में रहनेवालों के रहन-सहन की एक झलक मिली. एक सुव्यवस्थित सामुदायिक भवन भी दिखा जहाँ स्थानीय लोगों की अच्छी चहल -पहल थी. कहते हैं प्रकृति के गोद में रहने वाले लोगों का तन, मन, मिजाज, परिधान आदि कुछ भिन्न ही होता है, अमूमन कुछ बेहतर भी. हमें यह खूब दिखा. पहाड़ पर यहाँ-वहां बसे घरों के आसपास सफाई थी; लोगबाग साफ़ सुथरे वेशभूषा में नजर आये. मुर्गी के छोटे बच्चे छोटे-मोटे कीड़े आदि को  ढूंढने व खाने में मशगूल थे. चारों ओर हरियाली तो खूब थी ही. सब कुछ गुड -गुड लग रहा था, फिर भी कलिंपोंग को गुडबाय कह कर हम आगे बढ़ चले. जीवन चलने का नाम....    

                                                                                         
हमारी कार तीस्ता नदी पर बने एक पुल के पार आकर रुक गयी. हम सिलीगुड़ी –गंगटोक राजमार्ग यानी एन.एच -10 पर आ गए थे और अब सिक्किम प्रदेश में प्रवेश करने वाले थे. इस स्थान को रंगपो के नाम से जाना जाता है. 'रंगपो' सिक्किम के पूर्व में अवस्थित एक छोटा-सा क़स्बा है जो सिक्किम और पं. बंगाल की सीमा पर स्थित है. यह क़स्बा सिक्किम में प्रवेश करने का एक मुख्य द्वार है जो तीस्ता नदी के किनारे बसा है. सिक्किम में प्रवेश करनेवाले सभी वाहनों को रंगपो चेक पोस्ट पर पुलिस निरीक्षण के लिए रुकना अनिवार्य होता है. सो, हमारी कार के आगे और कई वाहन निरीक्षण की औपचारिकता पूरी करवाते हुए सरक रहे थे.

इस चेक पोस्ट पर पहुँचते ही सिक्किम पुलिस और पीछे छूटे पं. बंगाल पुलिस के बीच का फर्क सहज ही दिख गया. इस चेक पोस्ट पर तैनात पुरुष और महिला पुलिसकर्मी दोनों ही चुस्त-दुरुस्त एवं अपने काम में ज्यादा दक्ष दिखे. उनकी उम्र भी पैंतीस वर्ष से कम प्रतीत हुआ. ड्राइवर ने बताया कि वाहनों को चेक करने एवं वहां से आगे निकालने के लिए वे एक मानक प्रक्रिया का पालन करते हैं, जो पारदर्शी भी है.

रंगपो चेक पोस्ट से थोड़ा आगे बढ़ने पर सिक्किम के पहले बाजार में हम रुके. सड़क के दोनों ओर शराब सहित अन्य खान-पान की चीजें उपलब्ध थी. एक रेस्तरां में कुछ अल्पाहार लेने के बाद हम सिक्किम की राजधानी ‘गंगटोक’ की ओर बढ़ चले. सड़क की स्थिति बेहतर थी. गाड़ी ने रफ़्तार पकड़ी. कलकल कर बहती तीस्ता नदी से मिलते –बिछुड़ते हम सिंगतम के रास्ते पहाड़ पर चढ़ते जा रहे थे, एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर. आसपास का दृश्य बहुत ही मनोरम था. पहाड़ विविध प्रकार के वनस्पतियों से आच्छादित. मोबाइल में ही उन दृश्यों को कैद करने का प्रयास जारी था. साथ में डर भी था कि मोबाइल की बैटरी न ख़त्म हो जाए. गंगटोक पहुंचने तक बैटरी लाइफ को बचाते हुए चलने की मजबूरी थी. लिहाजा, ज्यादातर दृश्य मन-मानस में अंकित करने का प्रयास करने लगा.

बताते चले कि सिक्किम हमारे देश के उत्तर पूर्व भाग में अवस्थित एक पर्वतीय राज्य है. नजदीकी एअरपोर्ट बागडोगरा, जो पश्चिम बंगाल के दूसरे बड़े शहर सिलीगुड़ी से 11 किलोमीटर की दूरी पर है, से गंगटोक की दूरी करीब 125 किलोमीटर है. गंगटोक समुद्र तल से 5410 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित है. जनसंख्या की दृष्टि से यह भारतीय गणतंत्र का सबसे छोटा राज्य है, तथापि भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से यह विविधताओं से भरा प्रदेश है. सिक्किम की सीमा पं. बंगाल के साथ –साथ  नेपाल, भूटान, तिब्बत-चीन जैसे देशों से लगी है, इस कारण इसका सामरिक महत्व बढ़ जाता है. तीस्ता नदी को, जो सिक्किम के उत्तर से दक्षिण की ओर पूरे वेग से बहती है, इस प्रदेश का लाइफ –लाइन कहा जाता है. इस नदी में आपको रीवर राफ्टिंग का आनंद लेते युवाओं की टोली अनायास ही दिख जायेगी. यहाँ कई पन-बिजली उत्पादन केन्द्र हैं, जिससे पूरे सिक्किम को बिजली की आपूर्ति की जाती है. प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न इस प्रदेश में 25 से ज्यादा पर्वत चोटियां हैं, जिनमें विख्यात कंचनजंघा की चोटी सबसे ऊंची है. यहाँ दो सौ से ज्यादा छोटी –बड़ी झीलें हैं. शायद यही सब कारण है कि सिक्किम के रेल और हवाई मार्ग से न जुड़े होने के बावजूद यह हमारे देश के उत्तर पूर्व का एक प्रमुख पर्यटन केन्द्र है.


गाड़ी चल रही थी और घड़ी की सुई भी. एक बोर्ड पर नजर पड़ी, लिखा था रानीपुल – अब गंगटोक बस 12 कि.मी. दूर. पूछने पर ड्राईवर ने बताया कि इसे गंगटोक का ही हिस्सा माना जाता है, क्यों कि यह गंगटोक नगर निगम के अंतर्गत ही आता है.  इसे गंगटोक शहर का पूर्वी छोर कह सकते हैं. यहाँ कई स्कूल एवं व्यवसायिक प्रतिष्ठान  के अलावे दो बड़ी दवाई कम्पनी का प्रोडक्शन यूनिट कार्यरत है. पास में ही ‘मेफेयर स्पा रिसोर्ट एवं कैसिनो’ भी है, जिसके कारण यहाँ बराबर चहल–पहल रहती है.

गंगटोक के मुख्य बाजार तक पहुंचने से पहले ही ट्रैफिक अनुशासन का पता चलने लगा. आने-जानेवाली सभी गाड़ियाँ बिलकुल लाइन में चल रही थी. नो ओवर टेकिंग, नो बेवजह हॉर्न. गाड़ियों की लम्बी कतार थी, पर धीरे–धीरे आगे भी बढ़ती जा रही थी. थोड़ी-थोड़ी दूरी पर वाकी-टाकी लिए स्मार्ट पुलिस कर्मी अपने–अपने काम में लगे थे. 


गंतव्य आ गया था. होटल में पहुँचते ही एक कर्मी ने बताया और फिर दिखाया कि वह देखिए सामने प्रसिद्ध ‘कंचनजंघा’ पर्वत दिखाई पड़ रहा है. अच्छा लगा.  होटल और उसके आसपास सफाई दिखी. होटल के कमरे में पंखा नहीं था और न ही होटल में जेनेरटर या इन्वर्टर की सुविधा. कारण यह बताया गया कि यहाँ लोड शेडिंग न के बराबर होता है और सालोभर यहाँ का मौसम कमोबेश ठंडा होने के कारण पंखे की जरुरत महसूस ही नहीं होती. बेशक दोपहर के वक्त कभी-कभी गर्मी का एहसास हो जाए. कहने का तात्पर्य, मौसम है सुहाना, दिल है .....  आगे आप खुद समझदार हैं.                                                                          
पहाड़ पर बसे इस शहर में नीचे से काफी ऊपर तक मकान, दुकान, होटल, ऑफिस आदि कमोबेश ढंग से अवस्थित हैं. यहाँ  आवागमन घुमावदार मार्गों या पैदल सीढ़ियों के मार्फ़त होता है. यहाँ के बाशिंदों के लिए चलना और चढ़ना–उतरना एक ही तरह का काम है. बाजार में पैदल चलने वालों की तादाद अच्छी है.  यहाँ न साइकिल रिक्शा है, न टेम्पो और न ही आम छोटे  शहरों में धुआं छोड़ते मिनी बस. मोटर साइकिल, स्कूटर आदि भी बहुत कम ही दिखे. हाँ, कहीं भी आने-जाने के लिए शेयर और रिज़र्व टैक्सी उपलब्ध है. बोझ ढोने के लिए हर चौक–चौराहे पर मजदूर सुलभ हैं, जो रस्सी के फंदे के सहारे अपने पीठ और कंधे पर न जाने कितनी चीजें लेकर तेजी से चढ़ते –उतरते रहते हैं.


गंगटोक शहर अपेक्षाकृत साफ़–सुथरा है, लेकिन लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाये जाने की अच्छी गुंजाइश तो है ही. मुख्यतः पर्यटन पर आधारित वहां की अर्थ व्यवस्था को बेहतर बनाए रखने के लिए स्वच्छता पर और ज्यादा ध्यान देने की अनिवार्यता से कोई कैसे इन्कार कर सकता है. यूँ  भी देश–विदेश के विभिन्न जगहों और परिवेश से रोज आने वाले हजारों सैलानी शहर को जाने-अनजाने कुछ तो गन्दा करेंगे ही.

गंगटोक में अलग-अलग श्रेणी के अनेक होटल, लॉज, गेस्ट हाउस आदि हैं, जहाँ हर आय वर्ग के पर्यटक रुकते हैं. सड़क किनारे खुले में खाने –पीने की चीजें बिकते हुए कम ही नजर आये, बेशक टूरिस्ट स्पॉट्स को छोड़कर. करीब एक लाख के आबादी वाले  इस शहर में लोगों के रहन-सहन में महानगरीय खाई नहीं दिखती.

हमारे होटल के पास ही सिक्किम का पुलिस मुख्यालय था, बिना किसी सुरक्षा तामझाम के और थोड़ी चढ़ाई पर था गंगटोक का प्रसिद्ध शॉपिंग एरिया, महात्मा गांधी मार्ग यानी एम. जी रोड. वहां पहुंचने पर आपको लगेगा कि आप किसी विदेशी पर्यटन केन्द्र के मुख्य बाजार में आ पहुंचे हैं. इस रोड पर हर तरह के वाहन का प्रवेश निषेध है. दायें और बाएं दोनों ओर सड़क रंगीन टाइल्स से बनी है और चकाचक है. दोनों सड़क के बीच के हिस्से में बैठने की व्यवस्था है, जहाँ सैलानी घंटों बैठते हैं और उस स्थान की खूबसूरती और चहल-पहल का आनंद उठाते हैं. यहाँ यह जानना दिलचस्प होगा कि अगर आप महात्मा गांधी की ताम्बे के आदमकद मूर्ति को देखकर यह सोच रहे हों कि वहां के बाजार में सस्ती और सही मूल्य पर चीजें उपलब्ध होंगी  तो आपको निराशा हाथ लगेगी.


एक बात और. महात्मा गांधी मार्ग पर दर्जनों टूरिस्ट एजेंसी के बोर्ड सहज ही दिखाई पड़ेंगे. उनसे मिलने और कुछ जानकारी लेने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन कोई निर्णय करने से पहले उक्त मार्ग के प्रवेश छोर पर स्थित सिक्किम सरकार के पर्यटन एवं नागरिक विमानन विभाग द्वारा संचालित ऑफिस में जरुर जाएं. आपको बेहतर जानकारी मिलेगी. इससे आपको सही और गलत का भी पता चलेगा, जो आपके वक्त और पैसे के सदुपयोग के लिए जरुरी भी है, शायद सुरक्षा के लिहाज से भी.  ...आगे जारी.           (hellomilansinha@gmail.com) 
                                                                                     
                                                             फिर मिलेंगे, बातें करेंगे - खुले मन से ... ...
# प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका "नई धारा" में प्रकाशित 

Tuesday, January 23, 2018

MOTIVATION: SALUTING NETAJI SUBHAS CHANDRA BOSE

                                                                                                         - MILAN K SINHA
“You give me blood, I will give you freedom”- said Netaji Subhas Chandra Bose during our freedom struggle. He was one of the great leaders of that period whose only aim was to achieve freedom from British rule at the earliest.

Born in a well-to-do family in Cuttack on 23rd January, 1897, Subhas’s childhood was very eventful. His school education took place in Cuttack. He was brilliant in studies. He passed his matriculation examination in 1913 with very high marks. He then took admission in Presidency College, Calcutta where he studied for a brief period. He did his B.A in 1918 with philosophy as his main subject from Scottish Church College, Calcutta. During his college days he used to read passionately the teachings of Sri Ramkrishna Paramhans and his great disciple Swami Vivekananda. This had a definite bearing on this evolving thought process during that very turbulent time in Indian history.

In order to fulfil the desire of his advocate father, young Subhas sailed to England in 1919 for further studies and also to appear in ICS (Indian Civil Service) examination. He got through ICS examination with flying colours by securing fourth position. Notwithstanding his selection in ICS, he was not happy to serve the British Government due to his strong sense of opposition to oppressive British rule in India. Consequently, he resigned from ICS and came back to his motherland in April, 1921. He was the first Indian to leave ICS.

Young Subhas was full of enthusiasm, energy and knowledge. He started participating in activities of freedom movement actively. Mahatma Gandhi was the foremost leader of Indian National Congress and was at the centre of freedom movement. Subhas, however was ideologically closer to the tallest leader of Congress in Bengal, Chittaranjan Das who was well-known for his aggressive nationalism. In 1923, he was elected as the President of All India Youth Congress, the youth wing of Congress party. He was the editor of ‘Forward’- a newspaper started by Chittaranjan Das. In 1924 he served as CEO (Chief Executive Officer) of Calcutta Municipal Corporation (CMC) when Das was its mayor. Interestingly, Subhas also served as mayor of CMC in the year 1930.

For the British Government in India, Subhas was one of the main targets as he was becoming very popular among all sections of society, mainly youth who wanted freedom of the motherland as soon as possible. Consequently, he was arrested by the British administration more than ten times - first in 1925. He was sent to ‘Mandalay jail’ in Burma where he fell sick and was released when his condition became very serious.

The differences of Subhas with Gandhi and his close associates on ways and means to achieve independence were coming to the fore. Interestingly, at that point of time, Gandhi faction was in favour of Dominion status for India within the British rule, whereas Subhas and associates wanted complete self-rule.


Subhas Chandra Bose was elected President of Indian National Congress for two successive terms despite open opposition of Gandhi camp. It is interesting to know that at the time when he was contesting for his second term in 1939, he was not well and hence brought to the convention centre on a stretcher. Ironically, despite his election as President of Congress Party, he was not getting support in CWC (Congress Working Committee) meetings. Finally, Subhas was forced to resign by the Gandhi camp soon after. He then formed “All India Forward Bloc”-a new faction within Congress Party to voice his opinion and continue his struggle for freedom.

He travelled widely both in India and Europe. He used to have very extensive interaction with opinion makers, leaders and intellectuals during these visits. In one such visit to Germany in 1934, he met with Emilie Schenkl, the daughter of an Austrian in Berlin whom Subhas married in 1937.

The international power scene was also changing fast. World War-II erupted in 1939. Indians were sent to fight the war from British side. Thousands of countrymen were dying on the war front. Subhas was feeling agitated.

In 1941 he was put under house arrest in Calcutta, but this time Subhas escaped and travelled in the guise of a Pathan through Peshawar, Afganistan, Soviet Union etc. to finally reach Germany with great difficulty. World War–II was in full operation and countries like Germany and Japan extended their cooperation to Subhas for fighting the main common enemy country, Britain. He started his radio broadcast on issues related to Indian Freedom Struggle from Radio Berlin on a regular basis.


Subhas took over the charge of Indian National Army (Azad Hind Fauj) from Ras Bihari Bose in 1943. He gave a new dimension to its overall functioning by his dynamic and military leadership to make it a real challenge for British rule in India thereafter. He formed a separate ladies wing in INA, the “Rani of Jhansi Regiment” named after the great freedom fighter “Rani Lakshmi Bai” of Jhansi. He was the supreme commander of INA - a committed team of over forty thousand soldiers. Subhas used to inspire and motivate his IMA team by saying, “When we stand, the Azad Hind Fauz has to be like a wall of granite; when we march, the Azad Hind Fauz has to be like a steam roller.”  

He also formed a provisional government named “Azad Hind Government” which was recognised by a number of countries including Germany, Japan and Italy. He coined slogans like “Jai Hind” and “Dilli Chalo” which became very popular among Indian masses.  From that time the countrymen started calling him affectionately and respectfully by the name “Netaji”.

His reported unfortunate death on 18th August, 1945 in a plane crash in Taiwan is still a mystery due to several reasons.

Undeniably, Netaji will continue to be remembered as an exceptional soldier and leader of Indian Freedom Struggle.


             Will meet again with Open Mind. All The Best.