Saturday, January 12, 2019

स्वामी विवेकानन्द- युवाओं के प्रेरणा स्रोत... ...


                                                                         - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ...                                                                       
नरेन यानी नरेंद्र नाथ दत्त जिन्हें दुनिया आज स्वामी विवेकानन्द के नाम से जानती और सराहती है, का जन्म कलकत्ता के एक कुलीन और संभ्रांत परिवार में 12 जनवरी, 1863 के दिन हुआ था. उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाई कोर्ट के नामी वकील थे. उनके दादा जी दुर्गाचरण दत्त बांग्ला के अलावे संस्कृत तथा फारसी के विद्वान् थे और मात्र 25 वर्ष की उम्र में गृहस्थ जीवन को त्यागकर साधू बन गए थे. नरेन की मां भुवनेश्वरी देवी  धार्मिक विचारों से ओतप्रोत एक कर्तव्य निष्ठ महिला थी.

नरेन पढ़ने-लिखने में तेज थे तो खेलने और बाल सुलभ अन्य मामलों में भी. उनके घर में पूजा -पाठ, भजन-कीर्तन, पठन -पाठन आदि का अच्छा परिवेश था जिसका समग्र सकारात्मक असर नरेन के स्वभाव एवं संस्कार पर पड़ना स्वभाविक था. सब कुछ बढ़िया चल रहा था कि अचानक 1884 में उनके पिता का देहांत हो गया. उस समय नरेन 21 वर्ष के थे और उसी वर्ष उन्होंने बीए की परीक्षा पास की थी. पिता के गुजरने के बाद पूरा परिवार आर्थिक तंगी का शिकार हो गया. आगे के चार वर्ष काफी कठिन गुजरे. 1881 में उनकी मुलाक़ात रामकृष्ण परमहंस से हुई. युवा नरेन अपने गुरु से बेहद प्रभावित थे. फलतः उन्होंने  अपना जीवन रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर दिया. 

इस बीच जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आये. अप्रत्याशित आर्थिक तंगी के बीच सामाजिक विरोध-बहिष्कार के शिकार हुए; एकाधिक जगहों पर नौकरी की.  1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में भारत के प्रतिनिधि के रूप में अपना ऐतिहासिक भाषण देने से पूर्व करीब पांच वर्षों तक वे देश के विभिन्न भागों का एक सामान्य सन्यासी के रूप में  पैदल भ्रमण  करते रहे. इस व्यापक यात्रा में उन्होंने  देश के लोगों की वास्तविक स्थिति को अपनी आँखों से देखा, उसे खुद महसूस किया. मात्र साढ़े 39 साल की उम्र में 4 जुलाई, 1902 को विवेकानन्द ने अपना देह त्याग दिया.  

स्वामी विवेकानन्द ने 1897 में अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के नाम पर  'रामकृष्ण मिशन' की स्थापना की जो दशकों से आम देशवासियों के सामजिक-सांस्कृतिक-आध्यात्मिक उन्नति के लिए सतत कार्य करता रहा है.

स्वामी जी मनुष्य को श्रेष्ठतम जीव मानते थे.  देखिए क्या थे स्वामी जी के विचार:
  • मनुष्य सब प्रकार के प्राणियों से - यहाँ तक कि देवादि से भी श्रेष्ठ है. मनुष्य से श्रेष्ठतर कोई और नहीं. देवताओं को भी ज्ञान-लाभ के लिए मनुष्यदेह धारण करनी पड़ती है.... .... भगवान मनुष्य के भीतर रहते हैं; मानव शरीर में स्थित आत्मा ही एकमात्र उपास्य ईश्वर है; अगर  मैं उसकी उपासना नहीं कर सका, तो अन्य किसी भी मंदिर में जाने से कुछ भी उपकार नहीं होगा. 
  • जिस क्षण मैंने यह जान लिया कि भगवान हरेक मानव शरीर रुपी मंदिर में विराजमान हैं, जिस क्षण मैं हर व्यक्ति के सामने श्रद्धा से खड़ा हो सकूँगा और उसके भीतर भगवान को देखने लगूंगा – उसी क्षण मैं बन्धनों से मुक्त हो जाऊँगा....
स्वामी जी मनुष्य के कर्त्तव्य पर कहते हैं :
  • हमारा पहला कर्त्तव्य यह है कि अपने प्रति घृणा न करें; क्योंकि आगे बढ़ने के लिए यह आवश्यक है कि पहले हम स्वयं में विश्वास रखें और फिर ईश्वर में. जिसे स्वयं में विश्वास नहीं, उसे ईश्वर में कभी भी विश्वास नहीं हो सकता...
  • प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह अपना आदर्श लेकर उसे चरितार्थ करने का प्रयत्न करें. दूसरों के ऐसे आदर्शों को लेकर चलने की अपेक्षा, जिनको वह पूरा ही नहीं कर सकता, अपने ही आदर्श का अनुसरण करना सफलता का अधिक निश्चित मार्ग है..... 
  • जब तुम कोई कर्म करो, तब अन्य किसी बात का विचार ही मत करो. उसे एक उपासना के रूप में करो और उस समय उसमें अपना सारा तन-मन लगा दो.
स्वामी विवेकानन्द ने यह भी कहा: 
  • पहले रोटी और तब धर्म चाहिए. गरीब बेचारे भूखों मर रहे हैं और हम उन्हें आवश्यकता से अधिक धर्मोपदेश दे रहे हैं ...
  • संभव की सीमा जानने का केवल एक ही मार्ग है. और वह है असंभव से भी आगे निकल जाना 
  • युवा वह है जो अनीति से लड़ता है, जो दुर्गुणों से दूर रहता है, जिसमें जोश के साथ होश भी है, जो समस्याओं का समाधान निकालता है, जिसमें राष्ट्र को श्रेष्ठ बनाने का जज्बा है ....
  •  हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय पाप जनसमुदाय की उपेक्षा है, और वह भी हमारे पतन का कारण है. हम कितनी ही राजनीति बरतें, उससे उस समय तक कोई लाभ नहीं होगा, जब तक कि भारत का जनसमुदाय एक बार फिर सुशिक्षित, सुपोषित और सुपालित नहीं होता.....
आज जरुरत इस बात की है कि हम स्वामी जी के कर्म, विचार और व्यक्तित्व से सच्ची प्रेरणा लें और देश के सभी लोगों, खासकर करोड़ों गरीब जनता (स्वामी जी के शब्दों में 'दरिद्रनारायण') की भलाई के लिए सच्चे मन एवं सम्पूर्ण समर्पण से काम करें.  (hellomilansinha@gmail.com) 
                          ...फिर मिलेंगे, बातें करेंगे - खुले मन से ... ...
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Tuesday, December 18, 2018

यात्रा के रंग अनेक : श्री जगन्नाथ मंदिर और आसपास

                                                                                        - मिलन सिन्हा 
पुरी में सागर तट के पास स्थित अपने होटल में सुबह-सुबह स्नानादि से निवृत होकर हम चल पड़े विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर की ओर. यहां से मंदिर जाने के एकाधिक मार्ग हैं. हमने गलियों से गुजरते रास्ते  को चुना जिससे वहां के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की कुछ झलक मिल सके. गलियां आवासीय मकानों के बीच से होती हुई निकलती हैं. कस्बाई रहन-सहन. लोग सीधे-सादे. आपस में सटे-सटे ज्यादातर एक मंजिला- दो मंजिला मकान. कुछेक घरों में सामने के एक-दो कमरों में चलते दुकान. इन दुकानों में आम जरुरत की चीजें सुलभ हैं. यहाँ के निवासियों के अलावे सामान्यतः ऐसे गलियों का इस्तेमाल मंदिर तक पैदल आने-जाने वाले भक्तगण करते हैं. गलियों में टीका-चंदन लगाये खाली पैर चलते अनेक लोग दिखते हैं. स्थानीय उड़िया भाषा के अलावे पुरी के आम लोग हिन्दी और बांग्ला भाषा समझ लेते हैं, कई लोग बोल भी लेते हैं. 

मंदिर के आसपास फैले बाजार में पूजा-अर्चना की सामग्री से लेकर पीतल-तांबा-एलुमिनियम-लोहा-चांदी आदि के बर्तन व सजावट की वस्तुएं फुटपाथ तथा बड़े दुकानों में मिलती हैं. हैंडलूम के कपड़े एवं पोशाक का एक बड़ा बाजार है पुरी. यहां की बोमकई, संबलपुर एवं कटकी साडियां महिला पर्यटकों को काफी पसंद आती हैं. इसके अलावे हेंडीक्राफ्ट के कई अच्छे कलेक्शन भी उपलब्ध हैं. सुबह से रात तक यहाँ बहुत चहल-पहल रहती है. पर्व -त्यौहार  के अवसर पर तो यहाँ बहुत भीड़ और चहल-पहल  होना स्वभाविक है. मंदिर  के सामने यातायात को कंट्रोल करते कई पुलिसवाले हैं. यहां-वहां चौपाया पशु भी दिखते हैं.

बताते चलें कि पुरी में दूध से बनी मिठाइयों की क्वालिटी बहुत अच्छी है और ये सस्ती भी हैं. इससे यह अनुमान लगाना सहज है कि पुरी और उसके आसपास दूध प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है. हो भी क्यों नहीं, हमारे श्री जगन्नाथ अर्थात श्री कृष्ण अर्थात श्री गोपाल को दूध, दही, मक्खन इतना पसंद जो रहा है. फिर, उनके असंख्य भक्तों के पीछे रहने का सवाल कहां. हाँ, एक बात और. मौका  मिले तो राबड़ी, रसगुल्ला व दही का स्वाद जरुर लें. मंदिर के आसपास इनकी कई दुकानें हैं.  

करीब चार लाख वर्ग फुट क्षेत्र में फैले श्री जगन्नाथ मंदिर परिसर में प्रवेश के लिए सुरक्षा के मानदंडों का पालन अनिवार्य है. मोबाइल, कैमरा आदि बाहर बने काउंटर पर जमा करके ही अन्दर जाने की अनुमति है. मंदिर में प्रवेश के लिए चार द्वार हैं. पूर्व दिशा में स्थित है सिंह द्वार, जिसे मंदिर का मुख्य द्वार भी कहते हैं. पश्चिम द्वार को बाघ द्वार, उत्तर को हाथी द्वार और दक्षिण ओर स्थित द्वार को अश्व द्वार कहा जाता है.
    
हमें पुरी के “श्री जगन्नाथ मंदिर” में प्रवेश करते ही एक पंडा जी मिल गए, जो हमें मंदिर के सभी महत्वपूर्ण भागों में न केवल ले गए, बल्कि उसके धार्मिक-आध्यात्मिक पृष्ठभूमि की जानकारी दी. ज्ञातव्य है कि मुख्य मंदिर के आसपास तीस छोटे-बड़े मंदिर भी स्थित हैं. श्री जगन्नाथ मंदिर काम्प्लेक्स में ही माँ लक्ष्मी का भी मंदिर है, जहां जगन्नाथ जी के दर्शन के बाद जाने की परंपरा है.  

कहा जाता है कि चार धामों में शुमार “श्री जगन्नाथ मंदिर” की अनेक विशेषताएं हैं, जिनके विषय में जानकर अचरज में पड़ जाना अस्वाभाविक नहीं है. मसलन, मंदिर का रसोईघर दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर है; इस विशाल रसोईघर में भगवान जगन्नाथ को चढ़ाए जाने वाले महाप्रसाद को तैयार करने के लिए 500 रसोइए एवं उनके 300 सहयोगी एकसाथ काम करते हैं; मिट्टी के बर्तनों में सारा खाना पकाया जाता है; रसोईघर  में प्रसाद पकाने के लिए मिट्टी के सात बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं तथा  इंधन के रूप में लकड़ी का ही इस्तेमाल किया जाता है;  दिन के किसी भी वक्त मंदिर के मुख्य गुंबद की छाया अदृश्य ही रहती है; पुरी शहर के किसी भी भाग से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखें तो यह चक्र आपको हमेशा सामने से ही लगा हुआ दिखाई पड़ेगा; 214 फुट ऊँचे इस मंदिर के ऊपरी हिस्से में दिखने वाला ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता रहता है आदि.

जानने योग्य बात यह भी है कि अष्टधातु से निर्मित सुदर्शन चक्र को, जिसकी परिधि करीब 36 फुट है, नीलचक्र भी कहा जाता है एवं इसे बहुत ही पवित्र -पावन माना जाता है. ऐसी और भी अनेक ज्ञानवर्द्धक  बातें इस मंदिर के साथ जुड़ी है.

मंदिर के गर्भ गृह में एक रत्न मंडित चबूतरे पर भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा की मूर्तियां विराजमान हैं. ये तीनों मूर्तियां लकड़ी से बनी हैं, जिन्हें अनुष्ठानपूर्वक बारह वर्षों में एक बार बदला जाता है. 

मंदिर के शिखर पर लहराते ध्वज को बदलने का कठिन काम प्रतिदिन अपराह्न काल में करीब चार बजे के आसपास, यानी सूर्यास्त से पहले, किया जाता है. मंदिर के शिखर पर स्थित सुदर्शन चक्र के ऊपर सूर्य और चन्द्र अंकित लगभग 25 फुट लम्बा लाल या पीला एक बड़ा ध्वज लगाया जाता है, जो करीब 12 फुट ऊँचे सुदर्शन  चक्र से करीब 25 फुट और ऊपर सदैव लहराता रहता है. नील चक्र से नीचे की ओर अन्य अनेक छोटे –बड़े ध्वज लटकते –लहराते रहते हैं. सभी ध्वजों को रोज बदला जाता है. सौभाग्य से हमें इस पूरी प्रक्रिया को संपन्न होते हुए देखने का मौका मिला. हमारे तरह हजारों लोग इस रोमांचक दृश्य को देखने वहां मौजूद थे. कहते हैं, ऐसी भीड़ वहां उस वक्त हर रोज देखी जा सकती है. वाकई, इतनी ऊंचाई पर इतने ध्वजों को लेकर चढ़ना-उतरना, उन्हें उतारना–नए ध्वज लगाना,  बहुत ही जोखिम का काम है, तथापि इस कार्य को बड़ी कुशलता से मंदिर द्वारा अधिकृत दो व्यक्ति रोजाना नियमपूर्वक  करते हैं. मंदिर परिसर में ही “श्री जगन्नाथ जी” का प्रसाद प्राप्त करने की सुविधाजनक व्यवस्था कायम है.
                                                                                             
 पुरी में रथयात्रा सबसे बड़े  उत्सव के रूप में मनाया जाता है. नौ दिनों तक चलनेवाले इस अदभुत धार्मिक-आध्यात्मिक त्यौहार में स्थानीय लोगों के अलावे देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पूरे आस्था और उत्साह से शरीक होते हैं. इस मौके पर श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र और देवी सुभद्रा को लाखों श्रद्धालु इतने नजदीक से देख पाते हैं. रथयात्रा उत्सव आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को शुरू होता है. इस दिन अलग-अलग रथों में श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा को पूरे विधि –विधान से बिठाया जाता है और फिर  बड़ी संख्या में भक्तगण रथों को खींच कर दो किलोमीटर दूर गुंडिचा मन्दिर तक ले जाते हैं.

गुंडिचा मन्दिर बहुत ही खूबसूरत है जिसका निर्माण कलिंग वास्तुकला पर आधारित है. यह मंदिर श्री जगन्नाथ के मौसी घर के रूप में भी प्रसिद्ध है. श्री जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मन्दिर तक की सड़क बहुत ही चौड़ी और अच्छी है. सही है क्यों कि 60 फुट से ज्यादा चौड़े और 40 फुट से ज्यादा ऊँचे तीन रथों के साथ चलनेवाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए ऐसी व्यवस्था अनिवार्य है. लकड़ी से बने रथों को तैयार करने का काम हफ़्तों चलता है और फिर अंत में तीनों रथों को अत्यन्त कलात्मक ढंग से सजाया जाता है. इस यात्रा में सबसे आगे श्री बलभद्र का ताल ध्वज रथ, बीच में देवी सुभद्रा का पद्म ध्वज रथ और उसके पीछे श्री जगन्नाथ का गरुड़ ध्वज रथ रहता है. एकादशी को वापसी यात्रा यानी बहुडा के बाद तीनों प्रतिमाओं को जगन्नाथ मंदिर के गर्भ गृह में आस्था और भक्तिभाव से फिर से स्थापित किया जाता है. हर साल इसी समय यह  कार्य पूरे धूमधाम से संपन्न होता है. ऐसे अब तो देश-विदेश में अनेक स्थानों में इसी समय रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है. 

पुरी में श्री जगन्नाथ मंदिर और समुद्र तट श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए सबसे बड़े आकर्षण के केन्द्र रहे हैं, तथापि कई अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं जहाँ सालों भर पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है. श्री लोकनाथ मंदिर इनमें से एक है.  यह श्री जगन्नाथ मंदिर से करीब तीन किलोमीटर है. यह पुरी का सबसे पुराना मंदिर है जहाँ श्री लोक नाथ जी के नाम से भगवान शंकर की पूजा-अर्चना की जाती है. शिव रात्रि के मौके पर तो प्रत्येक वर्ष  यहां एक बड़ा मेला भी लगता है. 


नरेन्द्र या चंदन तालाब भी काफी खूबसूरत और लोकप्रिय पर्यटक स्थल है. यह स्थान श्री जगन्नाथ मंदिर से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर है. हर वर्ष अक्षय तृतीया से 21 दिनों तक यहां  श्री जगन्नाथ का जल विहार उत्सव मनाया जाता है. यह तालाब 873 फुट लम्बा और 834 फुट चौड़ा है. यह स्थान श्री जगन्नाथ के बुआ के घर के रूप में भी जाना जाता है. इस परिसर में छोटे-छोटे कई मंदिर हैं जिनमें देवी –देवताओं की प्रतिमाएं विराजमान हैं. आपके पास समय हो तो आप बेदी हनुमान मंदिर, सुदर्शन क्राफ्ट म्यूजियम और श्री सोनार गौरांग मंदिर भी जा सकते हैं. 

अंत में एक और बात. पुरी में घूमते हुए हमें बड़े-बड़े शॉपिंग सेंटर या मॉल दिखाई नहीं पड़े. सांस्कृतिक, पारम्परिक, धार्मिक और आध्यात्मिक जड़ें आज भी ज्यादा मजबूत हैं यहां, ऐसा स्पष्ट जान पड़ता है.
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Tuesday, December 4, 2018

यात्रा के रंग अनेक : पुरी-जगन्नाथधाम और सागर विशाल

                                                                                                  -मिलन सिन्हा 
ट्रेन नियत समय के आसपास ही पुरी के तीन नंबर प्लेटफॉर्म पर आ कर रुक गई. कई प्लेटफार्मों वाला पुरी रेलवे स्टेशन साफ़-सुथरा था.  इस दिशा का अंतिम स्टेशन होने के कारण डिब्बे खाली होने लगे और प्लेटफॉर्म पर यात्रियों का बहिर्गमन. आबोहवा में आद्रता की अनुभूति होने लगी. ट्रेन में हमारा डिब्बा पीछे होने के कारण निकास द्वार तक काफी चलना पड़ा, अपना-अपना ट्राली सूटकेस लेकर. ट्रेन के सहयात्रियों के साथ-साथ कुछ दूर तक ही सही, चलना अच्छा लगा. जाति, धर्म, भाषा, जिला-प्रदेश, गरीब-अमीर आदि भावनाओं से इतर सिर्फ मानवता का भाव लिए सभी इस यात्रा के अंत में अपने-अपने  गंतव्य की ओर अग्रसर थे. 

प्लेटफॉर्म से ही ऑटोवाले हमें हमारे रुकने के स्थान तक पहुँचाने के लिए तत्पर दिखे. एक–दो तो निकास द्वार तक आ गए – रेट वगैरह में कमीवेशी के बदलते ऑफर के साथ. बाहर निकला तो और अच्छा लगा. स्टेशन परिसर बहुत बड़ा और अपेक्षाकृत व्यवस्थित एवं साफ़–सुथरा. कुछ और सोचता, तबतक दो-एक रिक्शेवाले ने भी साथ चलने का आग्रह किया. एक क्षण तो ऐसा लगा कि हमें होटल तक पहुंचाने के चक्कर में रिक्शेवाले और ऑटोवाले के बीच झगड़ा न हो जाए. खैर, बात वहां तक पहुंचने से पहले ही ऑटोवाले को दूसरी सवारी मिल गयी और वह उधर लपका. हमें भी दूसरा ऑटोवाला मिल गया. इस सबके बीच मेहनत करके अपना पेट पालने को तत्पर कई लोगों से हमें फिर दो-चार होने का मौका मिला; अपने देश में कितनी बेरोजगारी है, इसका प्रमाण भी.

पुरी स्टेशन से निकलकर होटल के रास्ते हम बढ़ चले. इसी क्रम में पुरी का आकाशवाणी केन्द्र दिखा. इसी रास्ते में  दिखा राजभवन का पुरी परिसर एवं दो सरकारी गेस्ट हाउस. ऑटोवाले ने बताया कि ये सभी बड़े परिसर समुद्र तट पर स्थित हैं. तुरत यह ख्याल आया कि ब्रिटिश राज ख़त्म होने के सात दशक बाद भी जनता के प्रतिनिधि के रूप में उच्च पदों पर कार्यरत लोगों के लिए हर बड़े शहर में एक अलग आलीशान व सुसज्जित परिसर की जरुरत क्यों है ? लोकतंत्र में ऐसे आडम्बर और विलासिता के प्रतीक जिनके रख-रखाव पर हर साल आम जनता के टैक्स का लाखों का खर्च होता है, के स्थान पर करोड़ों गरीब-वंचितों के मुफ्त इलाज के लिए एक अच्छा अस्पताल खोला जा सकता है, अनाथ और अशक्त बच्चों के मुफ्त शिक्षा के लिए एक अच्छा स्कूल खोला जा सकता है या फिर जन कल्याण के ऐसे ही कई अन्य काम किये जा सकते हैं. इसी सोच-विचार में न जाने कब हम पुरी में समुद्र तट के निकट अवस्थित अपने होटल के पास पहुंच गए. 

होटल की सीढ़ियां चढ़ते हुए सोच रहा था कि ऐसी किसी भी यात्रा के दौरान अनायास ही हम-आप आशा-अपेक्षा, करुणा-प्रेरणा, हास-परिहास, सीखने-बताने, देखने-दिखाने, सोचने-विचारने सहित जीवन के  विविध रंग-बिरंगे अनुभवों-अनुभूतियों  से हो कर गुजरते रहते हैं. जीवन को जीवंत और समाजोपयोगी बनाए रखने में इसकी बड़ी भूमिका भी तो होती है! 
                                                                                                  
थोड़ा फ्रेश होकर हम सागर तट के पास स्थित अपने होटल से निकल पड़े. दो-तीन मिनट में हम समुद्र तट पर थे. पुरी के समुद्र की बात ही कुछ अलग है. साफ़ पानी, दूर तक फैला समुद्र, उसके साफ़ –सुथरे तट और उसके सामान्तर चलते मुख्य सड़क से सटे कतार में एक के बाद दूसरे होटल की लम्बी कड़ी. उत्तर भारत में जब अक्टूबर से फरवरी तक ठंढ से लोग ठिठुरते रहते हैं, तब पुरी में पर्यटकों की बहुत भीड़ होती है. कारण यहाँ मौसम बहुत सुहाना होता है – न ज्यादा गर्मी और न ज्यादा ठण्ड. सागर तट पर तो मेले जैसा माहौल रहता है. आज भी वहां वही हाल था. कुछ बच्चे और युवा तटीय रेत पर कुछ-कुछ खेल रहे थे तो कुछ घोड़े और ऊंट की सवारी का मजा ले रहे थे. तट पर हर तरह की खाने-पीने की चीज बिक रही थी - गोलगप्पे, चाट, भुट्टे, आलू चिप्स, हर तरह के मौसमी फल और तरह-तरह की मिठाइयाँ. मदन मोहन नाम से एक मिठाई भी थी. सुनकर चौंका. हिन्दी सिनेमा के प्रख्यात संगीतकार मदन मोहन के सुरीले संगीत से सजे गाने याद आ गए. मिठाईवाला आवाज लगाते आगे बढ़ गया था. झटक के उसके पास गया और छेने की रसदार मिठाई मदन मोहन का आनन्द उठाया. वाकई नाम के अनुरूप स्वादिष्ट.

तट पर घूमते हुए हमने देखा कि कहीं  मोतियों के हार बिक रहे थे तो कहीं भगवान जगन्नाथ, बलराम एवं देवी सुभद्रा के तरह-तरह के आकर्षक फोटो, छोटे-बड़े शंख, सीप से बनी चीजें आदि. रोचक बात है कि सागर तट के आसपास घूम-घूमकर मोती और मोती के हार आदि बेचनेवाले ज्यादातर लोग ओड़िशा के सीमा से लगे आंध्र प्रदेश के रहनेवाले हैं. उनसे बात करने पर पता चला कि समुद्र में पाए जाने वाले सीप से निकाले गये प्राकृतिक मोती के अलावे कृत्रिम मोती के व्यवसाय में ये लोग सालों से लगे हुए हैं. सागर तट पर टहलते-घूमते लोगों में बीच-बीच में यहां-वहां हलचल होते रहते हैं और आप लोगों को छोटे-छोटे झुण्ड में देख सकते हैं. दरअसल, जब भी कोई नाव समुद्र से तट पर आता है, तो साथ में जाल में फंसी मछली आदि के अलावे छोटे-बड़े सीप भी होते हैं, जिनमें प्राकृतिक मोती होने की बात नाविक-मछुआरे करते रहते हैं. ऐसे मोती को देखने और खरीदने की चाह में हलचल होती है, पर्यटकों की भीड़ लगती है. जानकार कहते हैं कि बिना जांचे-परखे सिर्फ जल्दबाजी में ऐसी खरीदारी घाटे का सौदा भी साबित हो सकता है. 


पुरी के समुद्र तट के सामान्तर मुख्य सड़क के फुटपाथ पर सुबह-शाम अनेक लोगों को टहलते-दौड़ते देखना अच्छा लगता है. यह सड़क आगे करीब तीन किलोमीटर तक वैसी ही खूबसूरत है. आगे एक लाइट हाउस भी है. आसपास की गलियों  में पर्यटकों को सहज आकर्षित करने वाली चीजों की स्थायी दुकानें भी हैं.
                                                                   
पुरी के समुद्र में स्नान करनेवाले और तैरते–खेलते हर उम्र के लोग बड़ी संख्या में आपको मिल जायेंगे –पूरे उत्साह, उर्जा और उमंग से लबरेज. ऐसे कार्यकलाप में शामिल युवाओं का छोटा-बड़ा ग्रुप भी आपको यहां-वहां दिख जायेंगे. स्नानादि करते वक्त कोई दुर्घटना न हो जाए, इसके लिए इहतियाती  इंतजाम के तहत समुद्र तट के पास ही विभिन्न स्थानों पर गोताखोर तथा सुरक्षाकर्मी मौजूद दिखे.

समुद्र किनारे बैठ कर सूर्योदय और सूर्यास्त का आनंद उठाना हर कोई चाहता है. प्रकृति का यह अप्रतिम सौन्दर्य आपको अंदर तक आनन्दित कर देता है, आपकी यादों में वर्षों तक रचा-बसा रहता है. ऐसे, सागर तट पर सैकड़ों लोग भी मिलेंगे जो घंटों रंग-बिरंगे छतरियों के नीचे कुर्सी या रेत पर बैठे  चाय, कॉफ़ी, कोल्ड ड्रिंक, गन्ने का रस, डाब आदि का सेवन करते और समुद्र की लहरों का आनन्द लेते रहते हैं. शायद उनके यहां  आने और आनंद के सागर में डुबकी लगाने के पीछे छुपी प्रेरणा या भावना को स्वर देने के लिए  पास ही में एक  झालमूढ़ी बेचने वाले के मोबाइल (एफएम ) पर यह गाना बज रहा था,  'दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन ....' 

कहने की जरुरत नहीं कि सुबह और शाम के वक्त सागर तट पर भीड़ ज्यादा होती है और चहल-पहल  भी. संध्या समय गर्मागर्म समोसे, आलू चाप, पकौड़ी आदि के साथ चाय-काफी का आनन्द उठाते पर्यटकों के झुण्ड छोटे-छोटे दुकानों के पास देखे जा सकते हैं. तट पर और उसके आसपास भी सफाई व्यवस्था को अच्छा बानाए रखने के लिए सफाई कर्मी तत्परता से लगे दिखाई पड़ते हैं. 

सागर तट पर घूमने के क्रम में सौभाग्य से हमें दिखे रेत पर रेत से अपनी कला का प्रदर्शन करते कई आर्टिस्ट. ऐसे तो इस कला की बात चलते ही विश्व प्रसिद्ध कलाकार सुदर्शन पटनायक का नाम सबसे ऊपर आता है जिनकी बनाई कलाकृतियों को आप पुरी के समुद्र तट पर बहुधा देख सकते हैं. लेकिन उनके अलावे भी कई लोग हैं जो नियमित रूप से अपने इस कला कर्म में तन्मयता से लगे दिख जाते हैं. दिलचस्प बात यह कि ये कलाकार रेत अर्थात बालू  पर कई घंटों के मेहनत से किसी कलाकृति का निर्माण करते हैं, जो महज कुछ घंटों तक ही प्रदर्शित हो पाता है. जानकर अच्छा लगा कि  हर साल नवम्बर के शुरू में पुरी समुद्र तट महोत्सव (पुरी बीच फेस्टिवल) बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. इसमें रेत कलाकार भी बढ़–चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. दरअसल इस फेस्टिवल में ओड़िशा की वास्तुकला, चित्रकला, व्यंजनकला आदि के साथ-साथ सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े रंग-बिरंगे कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, जो स्थानीय लोगों के अलावे पर्यटकों को भी पसंद आते हैं.   .... आगे जारी ....
                                        (hellomilansinha@gmail.com) 
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# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित 

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Friday, November 30, 2018

यात्रा के रंग अनेक : अब पुरी की ओर

                                                                                                      - मिलन सिन्हा 
कई सालों की इच्छा और अनेक बार बनाए गए कार्यक्रम को  साकार करने का दिन था. देश के एक प्रसिद्ध धार्मिक–आध्यात्मिक के साथ–साथ एक बेहद लोकप्रिय पर्यटन स्थल ‘पुरी’ प्रस्थान के लिए घर से निकला. ऑटो से हमें  हटिया स्टेशन जाना था. बताते चलें कि झारखण्ड की राजधानी रांची शहर में दो रेलवे स्टेशन है, एक रांची और दूसरा हटिया. दक्षिण पूर्व रेलवे के इस महत्वपूर्ण स्टेशन से रोजाना दर्जनों ट्रेनों का आना-जाना है. खैर, ऑटो से हम चल पड़े. घर से हटिया स्टेशन करीब पांच किलोमीटर होगा. रास्ते में कई चौराहे आते हैं. हर चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस आवागमन को सुचारू बनाए रखने के लिए तैनात रहती है. रांची की सड़कें ठीक-ठाक हैं, चौड़ी भी हैं, लेकिन कई स्थानों में अतिक्रमण का असर साफ दिखता है, हाई कोर्ट तक ने इस पर एकाधिक बार नाराजगी जताई है. सड़क पर हर तरह के वाहनों – साइकिल, मोटरसाइकिल, स्कूटर, रिक्शा, ठेला, ऑटो, कार, सिटी बस, स्कूल बस आदि की संख्या बढ़ती आबादी और अति सुलभ बैंक लोन (ऋण) के कारण निरंतर बढ़ती जा रही है. ट्रैफिक नियमों के अनुपालन में सुधार की बड़ी गुंजाइश तो है ही. ऐसी परिस्थिति में घर से स्टेशन पहुंचने के लिए सामान्य यात्रा समय से एक घंटे का मार्जिन लेकर चलने के बावजूद हम लोग ट्रेन खुलने से मात्र पांच मिनट पहले हटिया स्टेशन पहुंच सके, वह भी तब जब ऑटो चालक ने ज्यादा भीड़ वाले एक-दो चौराहे से पहले ही गलियों के रास्ते गाड़ी निकालने की बुद्धि लगाईं.    

वहां पहुँचते ही जाने क्यों स्मृति के एक कोने से गाने की ये पंक्तियां सुनाई देने लगी, गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है .... जल्दी से एक नंबर प्लेटफार्म पर पहुंचा. डिब्बे में सामान रखा. तपस्वनी एक्सप्रेस ट्रेन, जो अपराह्न 4 बजे हटिया से रवाना होकर अगले दिन सुबह 7.15 बजे पुरी स्टेशन पहुँचती है, समय से खुल गयी. 

कम समय में ही जितना देख पाया, हटिया स्टेशन परिसर की सफाई बेहतर लगी. सूटकेस –बैग आदि को ठीक से रखने और अपनी सीट पर इत्मीनान से बैठने के कुछ देर बाद डिब्बे का मुआयना कर लिया. सफाई सहित अन्य बातें भी संतोषप्रद थीं. 

अमूमन ट्रेन के सामान्य आरक्षित डिब्बे के एक खाने में आठ लोगों के शयन हेतु शायिका की व्यवस्था होती है. हम जहाँ बैठे थे वहां गाड़ी खुलते वक्त 6 लोग आ चुके थे. आपसी वार्तालाप में पता चला कि उनमें जो दो लड़के थे, वे भुवनेश्वर तक जायेंगे और हमारे अलावे एक अल्पवय दंपति पुरी तक. गाड़ी के रफ़्तार पकड़ते ही चाय, समोसा, चना, चिप्प्स आदि बेचने वाले आने-जाने लगे, अलग-अलग स्वर व अंदाज में आवाज लगाने लगे. ट्रेन यात्रा में ऐसे खाने –पीने का सामान बेचने वाले अगर न हो तो यात्रा कैसी होगी, ऐसा हमने कभी सोचा भी है ? शायद कई लोगों को भूखे-प्यासे ही सोना पड़े, जीभ जैसे संवेदनशील अंग को तरसते-तड़पते कई घंटे गुजारने पड़े, स्वरोजगार के मार्फ़त अपने और अपने परिवार का लालन-पालन करनेवाले अनेक लोगों को बेकार-बेजार रहना पड़े, अनेक पुलिसवाले और रेल कर्मियों को खाने-पीने के लिए अपनी जेब ढीली करने पड़े.... 

खैर, जैसे हमें उनकी जरुरत है, वैसे ही उन्हें हमारी जरुरत होती है. माने-न-माने दिलचस्प पहलू यह भी है कि क्रेता-बिक्रेता का यह अस्थायी संबंध हमारी यात्रा में हमें जाने-अनजाने जीवन के कितने अनछुए पहलुओं से परिचित  करवाता है, हमारे जीवन को थोड़ा और सक्रिय कर जाता है – सोच व भावनाओं के स्तर पर ही सही.    

करीब तीन घंटे के बाद एक बड़े स्टेशन पर गाड़ी रुकी और डिब्बे में हलचल हुई. कुछ लोग उतरे, कुछ लोग सवार हुए. नीचे उतरा. यह राउरकेला स्टेशन था. वही राउरकेला जो ओड़िशा राज्य के उत्तर-पश्चिम भाग में स्थित प्रदेश का तीसरा बड़ा शहर है. इस नियोजित शहर को अन्य बातों के अलावे सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित होनेवाले देश के पहले बड़े स्टील प्लांट के लिए जाना जाता है. जर्मनी के सहयोग से स्थापित होने वाले राउरकेला स्टील प्लांट के पहले वात भट्ठी (ब्लास्ट फरनेस) का उदघाटन देश के पहले राष्ट्रपति देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद द्वारा फरवरी,1959 में किया गया था.  

रात हो चुकी थी. राउरकेला स्टेशन का प्लेटफार्म बिलकुल साफ़ –सुथरा एवं रोशनी में नहाया हुआ लग रहा था. स्टेशन के दूसरे प्लेटफार्म पर नजर गयी तो वहां भी वैसा ही दृश्य था. इन दिनों रेल यात्रा के बेहतर होने, रेल परिचालन एवं व्यवस्था में बेहतरी की बात सुनने को तो मिल ही रही थी, आज देखा तो यकीन हो गया. उम्मीद है, आनेवाले दिनों में यह सिलसिला और सुदृढ़ होगा, क्यों कि उत्कृष्टता कोई मंजिल तो है नहीं, यह भी एक यात्रा ही तो है !

गाड़ी चल पड़ी. लौटा तो पाया कि इस बीच हमारे पास के दो शायिकाओं में ट्रेन में यात्रा के दौरान रात गुजारने दो यात्री आ गए थे. पूछा उनसे तो पता चला कि वे लोग पिछले दो वर्षों से राउरकेला में रहते हैं और आज भुवनेश्वर जा रहे है, एक ऑफिसियल मीटिंग में भाग लेने. राउरकेला के बाबत कुछ और जानने की इच्छा प्रबल हो उठी, सो उनसे पूछ बैठा. उन्होंने हमें बताया कि यह शहर सुन्दरगढ़ जिले में बसा है जो खनिज सम्पन्न इलाका है. दरअसल, यह एक कॉस्मोपॉलिटन सिटी है जो आधुनिकता और पारंपरिकता के साथ-साथ  जनजातीय संस्कृति को भी बढ़िया से समेटे हुए है. औद्योगिक शहर होने के कारण यहाँ देश के हर प्रदेश के लोग रोजगार और नौकरी के सिलसिले में आते-जाते रहते हैं.  1961 में स्थापित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी, राउरकेला) का भी इसमें विशेष योगदान रहा है. इसे ओड़िशा की व्यवसायिक राजधानी के रूप में भी जाना जाता है. यह इलाका नदियों और पहाड़ों से घिरा है. यहाँ दर्शनीय मंदिर और वॉटरफॉल भी हैं. उन्होंने स्थानीय लोगों के रहन-सहन, खान-पान आदि के बारे में भी बताया. 

कुछ देर बाद वे दोनों ऊपर आमने-सामने के बर्थ पर जा बैठे और फिर उनके बीच कामकाजी बातचीत चल पड़ी. एक ने कहा कि उनके बॉस एक काम ख़त्म होने से पहले ही दूसरे काम के लिए अनावश्यक दवाब बनाना शुरू कर देते हैं. ऑफिस समय के बाद वजह-बेवजह डांट–फटकार करते हैं, नौकरी से निकालने की धमकी तक देते रहते हैं. दूसरा व्यक्ति बीच-बीच में उसे प्रैक्टिकल बनने, बॉस को मैनेज करने, थोड़ा चालाक बनने की सलाह दे रहा था, जिसे उसका साथी यह कह कर नकार रहा था कि जब मै पूरी तन्मयता और ईमानदारी से काम कर रहा हूँ, तो गलत हथकंडे क्यों अपनाऊं? दोनों के बीच काफी समय तक गर्मागर्म बातचीत चलती रही. कहने की जरुरत नहीं कि देश –विदेश में खासकर कॉरपोरेट जगत में कार्यरत लाखों अच्छे व सच्चे युवा कर्मियों के लिए यह  मानसिक तनाव का बड़ा कारण रहा है. इसका बहुआयामी नकारात्मक असर खुद उस व्यक्ति पर तो पड़ता है, उसका परिवार भी उससे दुष्प्रभावित होता है. कहने का सीधा अभिप्राय यह कि कई मायनों में समाज के हर संवेदनशील व्यक्ति के लिए यह एक गंभीर विचारणीय विषय था, है और रहेगा जिसका प्रभावी समाधान व्यक्ति-समाज–सरकार को मिलकर ढूंढने की जरुरत है.

नौ बजने को थे. सबने खाने का उपक्रम शुरू किया, सिवाय एक यात्री के. खाना शुरू करने से पहले मैंने पूछा, तो उन्होंने  बताया कि उनका पेट गड़बड़ है. दिन में कुछ ऐसा-वैसा खा लिया था, सो अब उपवास. दवाई है, जरुरत होगी तो ले लेंगे. कहते हैं, उपवास भी पारम्परिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार एक प्रकार का उपचार ही है. शायद तभी भारतीय जीवन पद्धति में उपवास को स्वास्थ्य प्रबंधन का एक अहम हिस्सा माना जाता रहा है.

बहरहाल, अपने-अपने बर्थ पर लेटने के बाद भी बॉस प्रकरण पर कुछ देर तक उन दोनों के बीच चर्चा चलती रही, साथ में सहमति-असहमति का सिलसिला भी. उसी विषय पर विचार एवं समाधान मंथन के क्रम में मैं भी काफी वक्त तक जगा रहा. उस बीच वे लोग सो चुके थे, जिसका पता उनके खर्राटों से चल रहा था. बत्ती बुझा कर मैं भी सो गया.       

बीच में कई छोटे-बड़े स्टेशन आते रहे, ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर जंक्शन सहित. हलचल–कोलाहल भी होते रहे. क्षण भर के लिए उचटती-टूटती-फिर गहराती नींद के बीच करवटें बदलते हुए यात्रा जारी थी.
                                                                                              
सुबह जब नींद खुली तो ट्रेन एक छोटे से स्टेशन पर खड़ी थी. नाम था – साक्षी गोपाल.  वहाँ से पुरी की दूरी करीब 20 किलोमीटर थी. यह स्थान एक धार्मिक प्रसंग से जुड़ा है, ऐसा लोग कहते हैं. कथा कुछ ऐसी है : एक बार श्री कृष्ण अर्थात गोपाल दो ब्राह्मणों के बीच एक विवाद के निबटारे के सिलसिले में गवाह यानी साक्षी के रूप में यहाँ आये थे और इस स्थान की प्राकृतिक सुन्दरता से प्रभावित होकर कुछ दिनों तक रुके थे. कहने का तात्पर्य यह कि साक्षी देने के लिए गोपाल यहाँ आये थे, लिहाजा यह स्थान साक्षी गोपाल के नाम से जाना जाता है. स्टेशन से करीब एक किलोमीटर दूर मुख्य मंदिर है जहाँ श्री गोपाल की मूर्ति स्थापित है. इस स्थान को सत्यवादीपुर के नाम से भी जाना जाता है.

खैर, स्टेशन पर चाय, समोसा, चनाचूर आदि के स्थान पर सुबह-सुबह डाब अर्थात नारियल पानी बेचते कई लोग दिखे, वह भी बिलकुल ताजा और सस्ता भी. बहुत अच्छा लगा. शायद आप जानना चाहें, आखिर क्यों? तो बताते चलें कि स्वास्थ्य की दृष्टि से डाब एक बेहतर प्राकृतिक पेय है. इसमें काफी  मात्रा  में विटामिन - सी, मैग्नीशियम, पौटेशियम और दूसरे महत्वपूर्ण खनिज होते हैं. माना जाता है कि सुबह - सुबह नारियल पानी पीना ज्यादा फायदेमंद होता है. यह हमारे पाचन तंत्र को ठीक रखने,  रक्त चाप को नियंत्रित करने और सिरदर्द एवं माइग्रेन को कम  करने के साथ –साथ  हमारी अन्य कई शारीरिक समस्याओं में लाभकारी  सिद्ध  होता है. इसमें अपेक्षाकृत कम शूगर एवं फैट होने के कारण इसे  एक उपयुक्त  एनर्जी और स्पोर्ट्स ड्रिंक भी  माना जाता है.

ट्रेन आगे बढ़ी तो रेलवे लाइन के दोनों ओर दूर तक नारियल के पेड़ दिखते रहे, पूरे फलदार. सागर तट निकट आने का एहसास भी होता गया. हम पुरी पहुंचने को थे. पुरी अर्थात पुरुषोत्तम पुरी अर्थात जगन्नाथ पुरी ओड़िशा का एक छोटा शहर है; जिला मुख्यालय भी है. इसी जिले में विश्व प्रसिद्ध ‘कोणार्क मंदिर’ और ‘चिल्का लेक’ भी है. 
जिले में करीब आधा दर्जन मौसमी नदियों का जाल बिछा है. ये सभी मुख्यतः महानदी की शाखाएं हैं.  पुरी शहर की आबादी करीब तीन लाख है. धान यहाँ का मुख्य फसल है. ज्यादातर लोग छोटे व्यवसाय और कृषि से जुड़े हैं. ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर से यह ऐतिहासिक शहर करीब 60 किलोमीटर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी के समुद्र किनारे अवस्थित है. कई कारणों से पुरी पूरे देशभर के पर्यटकों के लिए बेहद पसंदीदा स्थल रहा है – बारहवीं शताब्दी में बना विश्व विख्यात जगन्नाथ मंदिर, दूर तक फैला खूबसूरत समुद्र तट, वहां के आतिथ्य पसंद लोग के साथ-साथ  रहने एवं खाने-पीने की बेहतर एवं अपेक्षाकृत सस्ती व्यवस्था. निश्चित ही ये सब भी अहम कारण होंगे कि रोजाना यहाँ औसतन 50 हजार पर्यटक आते हैं. ...आगे जारी ....    (hellomilansinha@gmail.com)                                                                                           ....फिर मिलेंगे, बातें करेंगे - खुले मन से ... ...
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित 
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com  

Friday, June 22, 2018

Wellness Point: Practice "Yoga" Regularly For Amazing Health Benefits

                                                                                             - Milan K Sinha

This year too large number of people from more than 170 countries across the world celebrated “International Yoga Day” on 21st June by  practicing Yoga. It is really heartening that Yoga - science of integrating body, mind and soul is getting ever growing acceptance in all time zones. Obviously, this is an appropriate moment to discuss few Yoga exercise (Asana) which would definitely benefit immensely, if we practice them consciously and sincerely on a regular basis. 

Yes, all Yoga activities should be practiced during morning hours after finishing washroom engagements and are initially to be practiced under the guidance of a suitable trainer. The asanas are:

1.Bhujangasana: It is also known as cobra pose asana.

Bhujangasana 

Benefits: This asana strengthens the spinal muscle; activates the function of kidney and liver; reduces abdominal fat and back pain. 
Point of caution: Those who have problem of hernia, have undergone abdominal surgery or are suffering from intestine related illness should avoid this asana. 

2.Shashankasana:

Shashankasana

Benefits: This asana improves the functioning of adrenal glands; enhances blood flow to the brain; makes the spinal cord, ankles and knees flexible; helps people suffering from constipation.
Point of caution: People suffering from slip-disc or gastritis and peptic ulcer should avoid this asana. 

3.Pashimottanasana:

Paschimottanasana

Benefits: This asana is very good for all, particularly persons suffering from diabetes, obesity and constipation. Actually it helps energise the whole body; stimulates the spinal nerves and back muscle; improves kidney function; improves digestion. 
Point of caution: Persons suffering from spondylitis, sciatica, abdominal ailments should avoid this asana.

Undeniably, there are many more yoga practices – Asana (Physical exercise), Pranayama (Breathing activity) and Dhyana (Meditation) to know, learn and practice regularly to keep us fit and fine- physically, mentally and spiritually. Nevertheless, it is  always better to start with a few simple but important yoga activities, continue it for few weeks and then go for a few more as per your experience, need and requirement.      (hellomilansinha@gmail.com)

             Will meet again with Open MindAll The Best.

Wednesday, May 2, 2018

यात्रा के रंग अनेक : गंगटोक से भारत-चीन सीमा की ओर

                                                                                - मिलन  सिन्हा
...गतांक से आगे ...  कहते हैं न कि ‘दिल है कि मानता नहीं’ या यूँ कहें कि यह दिल मांगे मोर. आखिर क्यों न मांगे ? सच तो यह है कि आपका, हमारा - सबका दिल कुछ और भी देखना चाहता है. दिल मांगे मोर.... तो हम सुबह-सुबह ही निकल पड़े एक बेहद रोमांचक यात्रा पर.

आज हमारे सारथी थे दिलीप, अपनी टाटा सूमो गाड़ी के साथ. गंगटोक में पले-बढ़े दिलीप अपने कॉलेज के दिनों और उसके बाद भी राजनीतिक कार्यकर्त्ता के रूप में काफी सक्रिय रहे. परिवार की जिम्मेदारी आने के बाद से वे इस काम में लगे हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से पूर्णतः जागरूक हैं. उनके पास सिक्किम के सभी बड़े राजनीतिक पार्टियों और उनके सभी बड़े नेताओं के कार्य-कलाप की अच्छी और ताजा जानकारी है. मुझे ये बातें दिलीप से चंद मिनट की बातचीत से पता चल गया. ऐसे अभी उसकी पत्नी एक बड़े पार्टी की सक्रिय मेम्बर है. दिलीप के साथ वार्तालाप से मुझे मोटे तौर पर सिक्किमवासियों के रहन-सहन, खान-पान आदि के बाबत भी काफी जानकारी मिली. मसलन, सामान्यतः आम सिक्किमवासी सफाई पसंद है, बेटा-बेटी में फर्क नहीं करते, बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक हैं, अधिकांश लोग मांसाहारी हैं, आदि. जानना दिलचस्प है कि 2011 के जनगणना के अनुसार सिक्किम में साक्षरता दर 82 प्रतिशत है, जो कि कर्नाटक, पश्चिम  बंगाल और तमिलनाडू से भी बेहतर है. उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, झाड़खंड और  बिहार से तो बहुत आगे है. सिक्किम देश का पहला राज्य है जो खुले में शौच से मुक्त बना. जैविक खेती करने के मामले में भी सिक्किम को देश का पहला राज्य बनने का गौरव प्राप्त है. 

गंगटोक से बाहर निकलते ही जवाहरलाल रोड पर हमें दो चेक पोस्ट पर रुकना पड़ा. सभी गाड़ियों को रुकना पड़ता है वहां.  उस रास्ते से भारत –चीन सीमा की ओर जानेवाले हर यात्री के पहचान पत्र और परमिट की पूरी जांच होती है –नियमपूर्वक बिना किसी भेदभाव के और बिना किसी लेनदेन के. गाड़ी के चालकों के लिए यह उनके रूटीन का हिस्सा है, लेकिन पर्यटकों के लिए एक नया अनुभव. हमारे गाड़ी के मालिक -सह-चालक दिलीप ने बताया कि जितनी गाड़ियां और जितने यात्री सुबह इधर से सीमा की ओर जाते हैं, वे सभी गाड़ियां एवं यात्री शाम को उधर से वापस आये कि नहीं इसका पूरा हिसाब रक्खा जाता है. कहीं  हेरफेर होने पर तुरत उसका संज्ञान लिया जाता है, त्वरित कार्रवाई की जाती है. हो भी क्यों नहीं, आखिर देश की सुरक्षा के साथ-साथ एक-एक यात्री की सुरक्षा-संरक्षा  का सवाल जो है.

  
सीमा सड़क संगठन (बॉर्डर रोड आर्गेनाईजेशन) के अंतर्गत आनेवाले  घुमावदार पहाड़ी सड़क पर अब हम धीरे धीरे भारत-चीन सीमा की ओर बढ़ रहे थे. इस स्थान को “नाथू ला पास” के रूप में जाना जाता है. गंगटोक से यहाँ की दूरी करीब 56 किलोमीटर है और समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग 14200 फीट है. बॉर्डर तक जाने के लिए यात्रा से एक दिन पहले सिक्किम सरकार से विशेष परमिट (पास) लेना अनिवार्य है. उधर जाने वाली प्रत्येक गाड़ी को भी परमिट लेना पड़ता है, बेशक गाड़ियां नाथू ला से पहले के एक-दो पर्यटक स्थान से होकर ही क्यों न लौट आये. परमिट बनवाने के लिए गंगटोक के प्रसिद्ध एम. जी. रोड पर स्थित सिक्किम टूरिज्म के ऑफिस या किसी भी अधिकृत टूर ऑपरेटर से संपर्क किया जा सकता है. हमारे ड्राईवर ने बताया कि हर दिन छोटी–बड़ी गाड़ियों का एक बड़ा काफिला, जिसकी संख्या स्थानीय प्रशासन द्वारा सुरक्षा सहित कई अन्य मामलों को ध्यान में रख कर तय किया जाता है, उस दिशा में जाता है. ऐसे, प्रशासन की यह कोशिश होती है कि ज्यादातर बड़ी गाड़ियां – सूमो, बोलेरो, स्कार्पियो आदि को तरजीह दी जाय जिससे कि ज्यादा लोग वहां तक जा सकें और वहां के सीमित पार्किंग स्पेस में गाड़ियों को पार्क किया जा सके; किसी भी तरह के जाम से बचा जा सके. 

जैसे –जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, हमें निरंतर एक पहाड़ी सड़क से अगले ऊंची सड़क पर पहुंचने का एहसास और रोमांच हो रहा था. दिलचस्प बात यह थी कि उल्टी दिशा से न के बराबर गाड़ी आ रही थी. कारण यह बताया गया कि सेना या प्रशासन की एक्का-दुक्का गाड़ियों को छोड़ कर सुबह के समय सभी गाड़ियां ऊपर की ओर जाती हैं और अपराह्न में वही गाड़ियां गंगटोक की ओर लौटती हैं. लिहाजा पहाड़ी सड़क में निरंतर घुमावदार रास्ते से चलने की बाध्यता के बावजूद भी गाड़ियां थोड़ी तेज ही चल रहीं थी. चालकों का दक्ष होना भी बड़ा कारण हो सकता है. रास्ते में हमें कहीं- कहीं सेना के पोस्ट एवं छावनी दिखाई पड़े. स्वभाविक रूप से वे इलाके ज्यादा साफ़ और व्यवस्थित लगे. 

पेड़-पौधों से आच्छादित ऊँचें-ऊँचे पहाड़ों के साथ और दूर ऊपर के रास्तों में आगे बढ़ते गाड़ियों की कतार को देख कर यह उम्मीद तो कायम थी कि हम आज “नाथू ला पास” और उसके नजदीक के अन्य दर्शनीय स्थानों का लुफ्त उठा पायेंगे. उस ऊंचाई पर पहाड़ों को हिमाच्छादित देखने का कौतुहल तो था ही. चालक ने बताया कि आज आगे ऊँचे  पहाड़ों पर हिमपात की संभावना है, कारण कल रात भी बारिश  हुई है और मौसम का मिजाज बता रहा है कि आगे हमें इसका आनंद लेने का मौका मिल जाएगा. ऐसे, अगर हिमपात होते हुए और पहाड़ों को बर्फ से ढंका देखने का अवसर मिल जाय, वह भी अप्रैल से सितम्बर के बीच तो समझिये आपका वहां जाना सफल हो गया, पैसा वसूल हो गया.

बहरहाल, नयनाभिराम प्राकृतिक दृश्यों का आनंद उठाते हुए हम आ पहुंचे गंगटोक से करीब 40 किलोमीटर की दूरी और करीब 7000 फीट ज्यादा ऊँचे स्थान पर अवस्थित  “सोमगो अर्थात छान्गू झील” के बिलकुल करीब. और अब हमें ऊँचें पहाड़ों पर यहां-वहां बर्फ के छोटे-छोटे चादर दिखने लगे. मन मचलने लगा ऐसे और भी दृश्य को आँखों और यादों में भरने को. 

यहाँ तक पहुंचने में हमें करीब तीन घंटे लगे. गत रात बारिश हुई थी, सो एक-दो जगह पर भू-स्खलन के कारण सड़क में अवरोध था जिसे ठीक करने में बॉर्डर रोड आर्गेनाईजेशन के कर्मी लगे हुए थे, फिर भी गाड़ियां धीरे –धीरे आगे बढ़ रही थी. हां, एक-दो बार गाड़ी थोड़ी देर के लिए रुकी जरुर. अच्छा ही हुआ. नीचे उतर कर चारों ओर देखने का एक मौका जो मिला. आगे –पीछे अनेक गाड़ियां थी, पर कोई हल्ला-गुल्ला नहीं था. ज्यादातर यात्री गाड़ियों  में ही बैठे थे. एक ओर ऊँचे पहाड़ और दूसरी ओर गहरी खाई. नजदीक से देखें तो चक्कर आ जाए. ड्राईवर ने दिखाया और बताया कि वह जो दूर ऊपर अलग-अलग ऊंचाई के सांपनुमा सड़क पर कई गाड़ियों के झुण्ड रेंगते दिख रहे हैं, उधर से ही हमें भी जाना है. सोचकर थोड़ा डर तो लगा, पर रोमांच की अनुभूति ज्यादा हुई.


यहाँ मतलब छान्गू झील के पास तक पहुंचने से कुछ देर पहले ही रिमझिम बारिश शुरू हो चुकी थी. लिहाजा ग्रीष्म काल में भी ठंढ का एह्साह होने लगा और स्वीटर के ऊपर गर्म जैकट भी चढ़ गया; कनटोप और मफलर भी निकल गया. ड्राईवर ने सिर्फ 10 मिनट का ब्रेक दिया जिससे कि लोग वाशरूम जा सकें; चाय-काफी पी सकें. ऐसा इसलिए कि हमारे मुख्य लक्ष्य अर्थात “नाथू ला पास”  तक जल्दी पहुंचना पहली प्राथमिकता थी, जो यहाँ से करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर है.  मौसम का कोई भरोसा जो नहीं था और बर्फ़बारी  भी शुरू हो चुकी थी. “नाथू ला पास” से लौटते वक्त छान्गू झील के पास ज्यादा देर तक रुकने का वादा ड्राईवर ने किया और गाड़ी आगे की ओर ले चला.

यहां यह जानना लाभदायक है कि “नाथू ला पास” जल्दी पहुंचने के फायदे भी कम नहीं. पहले तो गाड़ी पार्क करने में सुविधा, दूसरे वहां थोड़ा ज्यादा समय बिताने का अवसर, तीसरे शाम होने से पहले गंगटोक लौटने में आसानी और लौटते हुए बर्फ से आच्छादित कई स्थानों पर रुक कर फोटो खिचवाने का मौका. ऐसे हम भी समझ रहे थे कि सभी ड्राईवर ऐसी बातें करते हैं जिससे कि वे सीमित समय के भीतर यह टूर पूरा कर सकें. ऐसे इसमें गलत भी कुछ नहीं है. यात्री भी तो योजनानुसार टूर पूरा करना चाहते हैं, क्यों?

बहरहाल, चलते-चलते हम सोमगो अर्थात छान्गू झील के बारे में कुछ जान लेते हैं. यह स्थान समुद्र तल से 12300 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित है.  करीब एक किलोमीटर लम्बा  एवं लगभग 50 फीट गहरा  छान्गू झील चारों ओर से ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से घिरा हुआ है. ये पहाड़ साल में छः महीने से ज्यादा समय सफ़ेद बर्फ से आच्छादित रहते हैं. सोमगो का अर्थ होता है जल का स्रोत. पहाड़ों पर जमनेवाले बर्फ के पिघलने से इस झील  में पानी सालों भर रहता है. बेशक जाड़े के मौसम के अलावे भी तापमान ज्यादा गिर जाने से कई बार झील का पानी बर्फ से ढंक जाता है. ग्रीष्म एवं शरद काल में यहाँ कई तरह के मोहक फूल दिखाई पड़ते हैं, जो इस पूरे इलाके को और भी खूबसूरत बना देता है. शीतकाल में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों  को यहाँ देखा जा सकता है.

गाड़ी आगे बढ़ चली. पहाड़ों पर अब ज्यादा बर्फ दिखने लगे थे. आगे बीच-बीच में  यहां-वहां  सड़क मरम्मत का काम चल रहा था. बारिश के मौसम में पहाड़ी इलाकों में ऐसे दृश्य सामान्य हैं. आगे बढ़ने पर ड्राईवर ने बताया कि बस पास में ही है प्रसिद्ध बाबा मंदिर. लौटते वक्त यहां भी रुकेंगे, इस मंदिर को  देखेंगे. आइए, तब तक जान लेते है इस मंदिर के विषय में कुछ रोचक बातें. 


बाबा मंदिर “नाथू ला पास”  से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी  पर नाथू ला और जेलेप ला के बीच नाथू ला-गंगटोक मुख्य सड़क के निकट ही है. करीब 13,100 फीट की ऊंचाई पर स्थित  यह किसी देवी –देवता का मंदिर नहीं है. कहा जाता है कि बाबा मंदिर का निर्माण पंजाब  रेजीमेंट के एक जवान हरभजन सिंह की स्मृति में सेना के जवानों ने किया. बताया जाता है कि  वर्ष 1968  के जाड़े के मौसम में एक दिन कुछ पहाड़ी जानवरों को नदी पार करवाते समय एक हादसे में हरभजन सिंह नदी में डूब गए. साथी जवानों ने खोज की, पर वे मिले नहीं. फिर एक रात वे एक जवान के सपने में आये और बताया कि हादसे के बाद बर्फ में दब कर उनकी मौत हो गई है. दिलचस्प बात है कि सपने में बताये गए स्थान पर ही उनका शव मिला. सपने में ही साथी जवान से उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि उसी स्थान पर उनकी समाधि बनाई जाय. बाद में सेना के जवानों के द्वारा  उसी स्थान पर उनकी समाधि का निर्माण किया गया. बाबा मंदिर का निर्माण उसके कुछ अरसे बाद समाधि स्थल से थोड़ी दूर पर किया गया. स्वर्गीय हरभजन सिंह से जुड़ी कई बातें वहां के लोग अब तक रूचि लेकर साझा करते हैं.


आगे बढ़ने पर हमें मुख्य रास्ते के बिलकुल पास बैंक ऑफ़ इंडिया का एटीम दिखा -13200 फीट की ऊंचाई पर. बहुत अच्छा लगा. हमारे एक सह यात्री ने ड्राईवर से दो मिनट रुकने का अनुरोध किया. वे एटीम की ओर लपके और जल्द ही पेमेंट लेकर लौटे. वे बेहद खुश थे क्यों कि उन्हें पैसे की जरुरत थी, लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि इस स्थान पर एटीम होगा और बिना किसी दिक्कत के पेमेंट सुलभ होगा. थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर सड़क किनारे बॉर्डर रोड आर्गेनाईजेशन (बीआरओ) के एक हरे बोर्ड पर नजर पड़ी. लिखा था - “नाथू ला पास” तीन किलोमीटर दूर अर्थात अब हम अपनी मंजिल पर  पहुंचनेवाले थे. गाड़ी से उतरने से पहले ही ड्राईवर ने बताया कि  आगे बोर्ड पर जो कुछ लिखा है उसको फॉलो करना अनिवार्य है. इसके  मुताबिक़ आपको अपना कैमरा, मोबाइल फ़ोन आदि वहां नहीं ले जाना है अर्थात फोटो लेना वर्जित है. आप अगर बीपी, दमा आदि  के मरीज हैं तो डॉक्टर की सलाह से ही वहां जाएं, क्यों कि 14200 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस स्थान पर चारों ओर बर्फ ही बर्फ रहता है, और तापमान एवं ऑक्सीजन काफी कम.

“नाथू ला” कई मामलों में बहुत अहम है. आइये जानते हैं. 1950 में चीन द्वारा कब्ज़ा किये गए देश तिब्बत के दक्षिणी भाग में स्थित चुम्बी घाटी को भारत के सिक्किम प्रदेश से जोड़ने वाला स्थान “नाथू ला” है. यह हिमालय रेंज का पहाड़ी दर्रा है जिसके जरिए भारत  एवं चीन (चीन अधिकृत तिब्बत भी) के बीच अनेक वर्षों से व्यापार होते रहे. यह सिल्क रूट के नाम से जाना जाता रहा है. वर्ष 1958 में देश के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरु ने इस स्थान का दौरा किया. हाँ, 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार मार्ग करीब 44 वर्षों तक बंद रहा. 2006 में इसे फिर खोला गया. कहते हैं कि प्राचीन काल में भारत आनेवाले ज्यादातर तिब्बती एवं चीनी पर्यटक तथा व्यवसायी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते थे. एक बात और. कैलाश मानसरोवर तक जाने का यह ज्यादा सुगम मार्ग है, खासकर बुजुर्ग और बीमार तीर्थ यात्रियों के लिए, क्यों कि इस रास्ते यात्रियों  को कम समय लगता है और वे इस रास्ते मोटर गाड़ी से भी जा सकते हैं. वर्ष 2015 और 2016 में परम्परागत उत्तराखंड के लिपुलेख मार्ग के अलावे इस मार्ग का भी उपयोग किया गया. पिछले कुछ दिनों से भारत-चीन के बीच सीमा पर बढ़ते तनाव के मद्देनजर इस वर्ष (2017) तीर्थ यात्री नाथू ला होकर कैलाश मानसरोवर नहीं जा सके. आशा करनी चाहिए कि भविष्य में इस रास्ते को सामान्य आवागमन के लिए खोला जाएगा. 



तो अब गाड़ी से उतर कर हम चले वास्तविक भारत –चीन सीमा पर. इसके लिए सीढ़ियों से होकर ऊपर जाना पड़ता है. चूँकि रास्ते में जो हिमपात का सिलसिला शुरू हुआ था वह यहां पहुंचने पर और तेज हो गया था. सो, सीढ़ियां बर्फ से ढंक चुकी थी और  चलना  कठिन हो गया था. तेज हिमपात के कारण तापमान काफी गिर चुका था. ऑक्सीजन की कमी भी महसूस होने लगी थी. बावजूद इसके हमारा  हौसला बुलंद था. हम एक दूसरे का हाथ पकड़े धीरे –धीरे आगे बढ़ने लगे. बर्फ से ढंकी सीढ़ियों पर ऊपर की ओर जाने का यह अनुभव अपूर्व था. थोड़ा आगे बढ़ने  पर सेना के एक जवान ने हमें सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी कुछ हिदायतें दी और हमारी हौसला आफजाई भी की. हमें अच्छा लगा, उत्साह में इजाफा हो गया. घुमावदार  रास्ते से ऊपर जाना था. बच्चे और युवा तेजी से आगे बढ़ रहे थे. बुजुर्ग धीरे-धीरे और रुक-रुक कर. ऑक्सीजन की कमी से दम फूल रहा था. इस रास्ते चलते हुए बेनीपुरी जी की लिखी एक बात याद आ गई – जवानी की राह फिसलनभरी होती है. हालांकि यहां तो बर्फ के रास्ते  फिसलनभरे साबित हो रहे थे. नीचे बर्फ, निरंतर  हिमपात और ऊपर से बहती ठंढी हवा. कुल मिलाकर हाथ-पांव ही नहीं पूरा शरीर ठंड से ठिठुरने लगा. तभी दो कदम ऊपर एक छोटा- सा कमरा  दिखा जहां लोग अंदर-बाहर कर रहे थे. हम लपक कर उस कमरे के अंदर गए. आश्चर्य हुआ. वह एक छोटा रेस्टोरेंट था जहां चाय-कॉफ़ी के अलावे समोसा, बिस्कुट आदि भी बिक रहा था. देख कर हमें बहुत खुशी हुई. उस मौसम में उस ऊंचाई पर यह सब उपलब्ध होना आशातीत था. झट से कॉफ़ी का गर्म गिलास लिया और पहली चुस्की ली. कॉफ़ी अच्छी थी. बेशक स्वाद कुछ अलग सा लगा. पूछने पर पता चला कि यहां याक के दूध का ही प्रयोग होता है. रास्ते में कई स्थानों पर याक दिखाई तो पड़े थे, पर यह मालूम न था कि इस इलाके में याक के दूध ही बहुतायत में उपलब्ध हैं और सामान्यतः उसी का उपयोग किया जाता है. कहा जाता है कि शारीरिक तापमान एवं रक्तचाप को ठीक बनाए रखने में कॉफ़ी बहुत लाभदायक है. 

कॉफ़ी आदि लेने एवं वहां थोड़ी देर रुकने पर शरीर में उर्जा और उत्साह फिर से भर गया और हम निकल पड़े कठिनतर रास्ते से ऊपर पहुंचने को. निकलते ही रास्ते में उक्त रेस्टोरेंट के बगल में एक और कमरा दिखा जिसके बाहर चिकित्सा सुविधा कक्ष लिखा था. वहां सेना के मेडिकल स्टाफ ऑक्सीजन सिलिंडर एवं जरुरी दवाइयों के साथ मुस्तैद थे. हमें  बहुत सकून मिला; हम थोड़ा और आश्वस्त हुए. मन-ही-मन भारतीय सेना के जज्बे को सलाम करते हुए हम आगे बढ़ चले. आगे बढ़ने में दिक्कत तो हो रही थी, परन्तु ऊपर सीमा पर लहराता तिरंगा और उसकी आन-बान-शान को अक्षुण्य बनाये रखने को सर्वदा तत्पर एवं मुस्तैद भारतीय सेना के जवानों को  देखते तथा प्रेरित होते हुए आखिरकार हम पहुंच गए नाथू ला के भारत –चीन सीमा पोस्ट पर. हम सभी बहुत रोमांचित थे. आसपास सिर्फ बर्फ ही बर्फ. दूर जहां तक नजर गई, सभी पहाड़ बर्फ से आच्छादित थे. छोटे-छोटे सफ़ेद-भूरे बादल सर के ऊपर से आ-जा रहे थे. उनके लिए सीमा का बंधन जो नहीं था. इस अभूतपूर्व प्राकृतिक दृश्य के हम भी गवाह बन पाए, इसकी खुशी थी. 

14200 फीट ऊँचे बर्फ से ढंके पहाड़ पर कांटे तार की जाली से सीमा निर्धारित थी. इस पार  हमारे सैनिक गश्त लगा रहे थे तो उस पार चीनी सेना के जवान. वहां तैनात एक-दो जवानों से हमारी थोड़ी बातचीत हुई; देश को सुरक्षित रखने के लिए हमने उनके प्रति आभार व्यक्त किया और उन्हें शुभकामनाएं दी. सच मानिए, वहां खड़े होकर हमारे मन में न जाने कितने अच्छे ख्याल आ रहे थे. मसलन, दुनिया के छोटे-बड़े सभी  देश अगर एक दूसरे की भौगोलिक सीमा का पूरा सम्मान करे तो हर देश के रक्षा बजट में कितनी कमी आ जाय; उन पैसों का इस्तेमाल अगर गरीबी, बीमारी, भूखमारी आदि के उन्मूलन के लिए किया जाय तो विश्व के सारे देश मानव विकास सूचकांक में कितना आगे बढ़ जाएं.... ....

बहरहाल, यथार्थ  में लौटते हुए ध्यान आया कि हमारे गाड़ी के चालक ने घंटे भर के अन्दर लौट आने के लिए कहा था. तो हम लौटने के लिए तत्पर हुए. हिमाच्छादित पहाड़ से नीचे उतरना भी कम जोखिम भरा नहीं होता है. इस अनुभव से हम गुजर रहे थे. हमसे थोड़ा  आगे चलते एक युवा दंपति को अभी-अभी फिसलते एवं चोटिल होते देखा था. वो तो उनके साथ चलते लोगों ने उन्हें बीच में ही सम्हाल लिया, नहीं तो बड़ी क्षति हो सकती थी. खैर, साथी हाथ बढ़ाना की भावना को साकार करते हुए एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बहुत धीरे-धीरे हम नीचे तक सुरक्षित आ गए. हमारे सह-यात्री भी आ चुके थे. गाड़ी में बैठे तो शुरू हो गई बातें  सीमा पर  बिताये उन यादगार पलों की. 



ड्राईवर गाड़ी बढ़ा चुका था उल्टी दिशा में यानी गंगटोक की ओर. रास्ते में बाबा मंदिर और सोमगो अर्थात छान्गू झील पर भी तो हमें रुकना था. 

बस दस मिनट में हम आ गए बाबा मंदिर,  बीच में एक स्थान पर रुकते हुए. रुकने का सबब यह था कि सड़क के दोनों ओर पहाड़ की तलहटी तक बर्फ फैला था और हम सबों का मन बच्चों की तरह मचल रहा था, बर्फ से खेलने को; फोटो खिचवाने को. बर्फ की बहुत मोटी परत यहां से वहां सफ़ेद मोटे बिछावन की तरह बिछी हुई थी. अदभुत. 

चारों ओर बर्फ ही बर्फ. हिमपात जारी था, सो बहुत दूर तक साफ़ देखना कठिन हो रहा था. ठंढ भी उतनी ही. खैर, बच्चों और युवाओं ने तो बहुत धमाचौकड़ी और मस्ती की. बर्फ के बॉल बना-बनाकर एक-दूसरे पर निशाना साधा गया. कुछ लोग पहाड़ पर थोड़े ऊपर तक फिसलते हुए चढ़े भी. सेल्फी का दौर भी खूब चला. बड़े –बुजुर्गों ने भी बर्फ पर बैठकर-लेटकर उस पल का आनंद लिया और कुछ फोटो खिंचवाए, कुछ खींचे भी. तभी हमारी नजर भारत तिब्बत सीमा पुलिस के एक बोर्ड पर पड़ी. लिखा था, “ ताकत वतन की हमसे है, हिम्मत वतन की हमसे है....” सच ही लिखा है. ऐसे कठिन परिस्थिति में अहर्निश देश सेवा वाकई काबिले तारीफ़ है. 



इधर, सड़क किनारे खड़ी गाड़ी में बैठे ड्राईवर हॉर्न बजा-बजा कर हमें जल्दी लौटने का रिमाइंडर देते रहे. सो इन अप्रतिम दृश्यों को आँखों और कैमरे में समेटे हम लौट आये.  

बाबा मंदिर के पास पार्किंग स्थल पर बड़ी संख्या में सुस्ताते गाड़ियों को देखकर अंदाजा लग गया था कि मंदिर में काफी भीड़ होगी. अब हम मंदिर के बड़े से प्रांगण में आ गए थे. यहां तीन कमरों के समूह में बीच वाले हिस्से में बाबा हरभजन सिंह के मूर्ति स्थापित है और सामने दीवार पर उनका एक फोटो भी लगा है. बगल के एक कमरे में उनसे जुड़ी सामग्री मसलन उनकी वर्दी, कुरता, जूते, बिछावन आदि बहुत तरतीब से रखे गए हैं. पर्यटक और श्रद्धालु  उन्हें श्रद्धा  सुमन अर्पित कर निकल रहे थे. 

वहां से बाहर आते ही हमें सामने पहाड़ के बीचोबीच  शिव जी की एक बड़ी सी सफ़ेद मूर्ति दिखाई दी. दूर से भी बहुत आकर्षक लग रहा था. कुछ लोग पहाड़ी रास्ते से वहां भी पहुंच रहे थे. समयाभाव के कारण हम वहां न जा सके. हमें ड्राईवर दिलीप ने बताया कि सामान्यतः वैसे पर्यटक जिन्हें सिर्फ बाबा मंदिर तक आने का ही परमिट मिलता है, उनके पास थोड़ा ज्यादा वक्त होता है और उनमें से ही कुछ लोग ऊपर शिव जी की मूर्ति तक जाते हैं.

वहां से लौटते हुए भी कई स्थानों पर रुकने की इच्छा हो रही थी, लेकिन ड्राईवर ने यह कह कर मना  किया कि आगे सोमगो अर्थात छान्गू झील पर ज्यादा वक्त गुजारना  बेहतर होगा. सही कहा था उसने.  ऐसा सोमगो अर्थात छान्गू झील पहुंचने पर हमें लगने लगा.

ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच में मुख्य सड़क के बिलकुल बगल में है यह लम्बा खूबसूरत  झील. गाड़ी रुकते ही हम उतर कर झील के किनारे पहुंच गए. तुरत ही सामने से बड़ा- सा काला-सफ़ेद याक आ पहुंचा. याक की आंखें कुछ बोल रही थी, शायद यह कि यहां आये हैं तो मेरी सवारी का भी आनन्द ले लीजिए, अच्छा लगेगा आपको और मुझे भी. मेरा मालिक भी खुश होगा और आपके  जाने के बाद मुझे सहलायेगा, प्यार से खिलायेगा .... हमारे मालिक के लिए यह आमदनी का छोटा जरिया है, क्यों कि साल के कुछ ही महीने आप जैसे पर्यटक आ पाते हैं यहाँ... कहते हैं, बच्चे भगवान का रूप होते हैं, मन की बात खूब समझते हैं. याक भी कैसे अपनी भावना उनसे छुपा पाता. तो बच्चे याक की सवारी के लिए मचलने लगे. युवा और महिलायें भी साथ हो लिए. एक-एक कर सब सवारी का मजा ले रहे थे. फोटो सेशन भी हुआ. सेल्फी का दौर तो चलना ही था. बताते चलें कि याक के सींगों को कलात्मक ढंग से रंगीन कपड़ों से सजाया गया था. उसके पीठ पर रखा हुआ गद्दा भी सुन्दर लग रहा था.



दिन ढल रहा था, पहाड़ों पर फैले बर्फ की चादरों का रंग बदलता जा रहा था, गंगटोक लौटने वाली गाड़ियां लम्बी कतार में खड़ी थीं, ठंढ से ठिठुरते लोगों की भीड़ चाय-काफी की दुकानों में लगी थी, बच्चे दोबारा याक की सवारी की जिद कर रहे थे... सच कहें तो मनोरम दृश्य के बीच ये सारी बातें फील गुड, फील हैप्पी का एहसास करवा रही थी. अंधेरा होने से पहले गंगटोक पहुंचने की बाध्यता नहीं होती तो किसे लौटने की जल्दी होती ! खैर, गाड़ी में आ बैठे हम मन-ही-मन यह दोहराते हुए : जल्दी ही आऊंगा फिर एक बार, देखेंगे-सीखेंगे और भी बहुत कुछ, करेंगे हर किसी से बातें भी दो-चार... …                 ( hellomilansinha@gmail.com)                                                                                        फिर मिलेंगे, बातें करेंगे - खुले मन से ... ...
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित