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Tuesday, January 8, 2013

POEM : PLEASANT CHANGE

                                                                       By MILAN K SINHA

Switch off your mind
for a while.
Open your heart.
Go out
for early morning walk.
Enjoy the fresh air.
Identify yourself with -
the rising sun,
the birds flying in the sky,
the farmers in the fields,
the workers running towards factories,
the children playing, quarreling,
dancing, singing...
and lots more.
You would feel 
a pleasant change 
in your personality.
It would definitely be more
confident, positive, empathetic, contended...
                           
          Will meet again with Open Mind. All the Best.

Saturday, October 27, 2012

कविता : कारों में भीड़ नहीं

                                                                                               -मिलन सिन्हा
        लहूलुहान सड़कें 
             कारों में भीड़ नहीं,
          कारों की भीड़ है
          पक्षी सब सहमे से
          सहमे से नीड़ हैं
          सूखते उजड़ते पेड़ हैं
          लहूलुहान सड़कें हैं
          सूख रही धरती है
          फटी फटी परती है
          सूखे नदी ताल हैं
          घर घर अस्पताल है
          गाँव नगर सोये से
          जागता श्मशान है I


                     Will meet again with Open Mind. All the Best.

Sunday, October 21, 2012

हास्य व्यंग्य कविताएं : संकट, योजना

                                                                                                  - मिलन सिन्हा
संकट
नेताजी से जब 
एक पत्रकार ने पूछा ,
महाशय, तेल  संकट  पर 
क्या हैं आपके विचार ?
तो कहा  नेताजी ने हँसते हुए ,
 कहाँ  तेल संकट
जो करें सोच विचार .
अरे , हमारे  घर  तो  रोज 
हजारों  लोग आते हैं 
और हमें लगाने के लिए 
भर-भर टीन तेल 
साथ लाते हैं !


योजना 

मंत्री जी ने कहा,
अगले पंच वर्षीय  योजना में 
गावों  से 
गरीबी  हटायेंगे .
ऐसा लगता है 
जैसे कि  वे उसे (गरीबी को)
शहर में ले जायेंगे !

                                   Will meet again with Open Mind. All the Best.

Sunday, October 14, 2012

हास्य व्यंग्य कविता : आरोप और आयोग

                                                                                            -- मिलन सिन्हा
 आरोप और आयोग 
हमारे महान देश में 
जब जब घोटाला होता है 
और
हमारे  मंत्रियों , नेताओं  आदि पर
गंभीर आरोप लगाया जाता है,
तब तब सरकार  द्वारा
पहले तो इसे बकवास
बताया जाता है.
लेकिन,
 ज्यादा हो-हल्ला होने पर
एक जांच आयोग
बैठा दिया जाता है.
आयोग का कार्यकाल
महीनों, सालों का होता है.
आयोग में
ऐसे-ऐसे  लोग रक्खे जाते हैं
जो जल्दबाजी में
 विश्वास नहीं करते हैं
और
 गोल-मोल अनुशंसा करने में
बहुत दक्ष माने जाते हैं.
वे जानते हैं,
 सरकारी व्यवस्थाओं की भांति
लोगों की यादाश्त भी
काफी कमजोर होती है .
सो, कुछ ही दिनों के बाद
 सारी बातें
आई गई  हो जाती हैं
और फिर
आयोग का जो भी रपट
जब भी आता है
 उसका कुल योग
यह होता है  कि
उनके सुझाओं को
सरकार  कैसे लागू करे
इसके लिए
एक नया आयोग
 फिर गठित  होता है .
इस  तरह
इस महान देश में
घोटाले होते रहते हैं
विवाद उठते रहते हैं
और
आयोग बैठते रहते हैं !

 Enjoy your Sunday. will meet again with Open Mind. All the Best.

Friday, October 12, 2012

तीन लघु कविताएं : नजरिया, बाहरी आदमी, चिंता

                                                                                         - मिलन सिन्हा

 नजरिया
मैं जो था 
कमोबेश वही हूँ 
समय के साथ 
अगर 
कहीं कुछ  बदला है 
तो वह है 
मेरे प्रति 
लोगों का नजरिया !

बाहरी  आदमी
मैं 
परेशान हो उठता हूँ 
जब खुद को 
बाहरी आदमी बनकर 
देखने लगता हूँ !

 चिंता 
मेरे 
इस दुनिया में रहने 
या न रहने से 
उनका 
कुछ नहीं बिगड़ता है .
उन्हें तो 
केवल चिंता है 
चारों तरफ हवा में तैरते 
मेरे नाम की !

                           will meet again with Open Mind. All the Best.

Sunday, October 7, 2012

लघु कविताएं : प्रतिफल, नयी फसल, बदलाव

                                                                                               - मिलन सिन्हा  
प्रतिफल 
एक बार 
अंधेरे में 
रात खो गई 
रोने लगी 
रोती रही ,
पर 
कोई रास्ता
 दिखानेवाला 
नहीं मिला।

नयी फसल 
उसके दिल में 
बिजली चमकी 
आखों से 
पानी बरसने लगा 
दिमाग की जमीन
 ठीक से सींच गई 
और अब 
नयी फसल के आसार 
अच्छे लगने लगे। 

बदलाव 
अंधेरा 
आदमी में 
खो गया 
और आदमी 
सूरज बनकर 
चमकने लगा। 

       will meet again with Open Mind. All the Best.

Tuesday, October 2, 2012

कविता : जवान और किसान*

                                                                                                               -मिलन  सिन्हा
हरा भरा खेत खलिहान 
फिर भी 
निर्धन क्यों हमारे किसान .
देश में नहीं 
पानी की कमी 
फिर भी 
क्यों रहती है  सूखी 
यहाँ - वहाँ की जमीं .
जिसे देखना है वो देखें 
किसान जो उपजाता है 
उसका वह क्या पता है ?
देश को खिलानेवाला 
खुद क्यों भूखा रह जाता है ?
कर्ज के बोझ तले 
क्यों खुदकुशी कर लेता है ? 

देश में लाखों नौजवान 
साहसी,शिक्षित और उर्जावान 
छोड़कर अपना घर-वार 
बनते हैं सीमा के पहरेदार 
गर्मी हो या सर्दी 
आंधी हो या हो तूफान 
करते हैं देश की सेवा 
देकर आपनी जान .
युद्ध हो या हो कोई आपदा 
रहते हैं तैयार 
हमारे जवान सदा सर्वदा 
पर क्या इन जवानों का भविष्य 
सुरक्षित रह पाता है?
देश इनको 
पूरा सम्मान दे पाता  है?
कहाँ हैं वे देश के लाल 
जो लाल बहादुर कहलाएं,
जय जवान, जय किसान का 
वह गौरव फिर से लौटाएं .

*(शास्त्रीजी के जन्म दिन के अवसर पर)   


                        will meet again with Open Mind. All the Best.

Sunday, September 30, 2012

हास्य व्यंग्य कविताएं : मांग, पक्षपात, दूरदर्शी, शादी

                                                                                                * मिलन सिन्हा 
मांग 
एक बार उसने 
उसकी 'मांग ' भरी 
और फिर, 
जीवनभर  उसकी  'मांगों' से 
उसे छुटकारा नहीं मिला !

पक्षपात 
नेताजी हर जगह 
हिन्दी के पक्ष में बोलते हैं .
पर, जब भी  बोलते हैं 
बस, अंग्रेजी में ही बोलते हैं !

दूरदर्शी 
  बड़ा होकर वह 
धावक बनेगा
तभी तो भविष्य में 
अपने पिता की तरह 
कुर्सी दौड़  में 
हमेशा आगे रहेगा !

शादी 
स्वतंत्रता  दिवस पर 
वे बहुत उदास रहते हैं। 
अपने कमरे में दिनभर 
चुपचाप पड़े रहते हैं .
लोग कहते हैं 
उस दिन उनकी 
छिन गई  थी  सारी  आजादी 
क्यों कि उसी दिन
 हुई  थी उनकी शादी ! 

 Did you enjoy the poems? Do comment. will meet again with Open Mind. All the Best.

Thursday, September 27, 2012


कविता : कुछ बात बने                                    
                                                                                      * मिलन  सिन्हा 


दुःख में भी सुख  से रह सको तो कुछ बात बने।
पहले खुद को पहचान सको  तो कुछ बात बने।

जानता हूँ , तुम वो नहीं जो तुम हो 
जो तुम हो, वही रह सको तो कुछ बात बने।

माना की दुनिया बड़ी जालिम है फिर भी 
जालिम को भी तालीम दे सको तो कुछ बात बने।

आसपास देखोगे तो बहुत कुछ सीखोगे 
आपने पड़ोसी को भाई मान सको तो कुछ बात बने।

ऐसा नहीं है कि जो कुछ  है  यहाँ सब कुछ बेवजह है 
बेवजह जो है उसकी वजह जान सको तो कुछ बात बने।

न जाने क्या - क्या बन रहें हैं  आजकल लोग  
तुम आदमी बनकर रह सको तो कुछ बात बने।

   Did you enjoy the poem? will meet again with Open Mind. All the Best.

Tuesday, September 25, 2012

POEMS OF LOVE FOR EVERYONE


THREE POEMS                                       -By Milan K Sinha


1. POEMS OF LOVE

I took out
some poems
from within. 
Decorated them artistically.
Gave them natural fragrance.
And then,
gifted them to everybody I met.
As a result, 
my whole life
got flooded with poems of love!


2. HAPPY LIVING

Life is like a boat.
Death is like an ocean.
When  the tides would
gulp the boat,
no one can foretell.
So,why not live happily
and let others also live happily?

3. NIGHT LOST HER WAY

Once, 
night lost her way
in darkness.
She started weeping in terror.
She kept on weeping and screaming.
But no one rescued her!

                          will meet again with Open Mind. All the Best.

Sunday, September 23, 2012

दो हास्य व्यंग्य कविताएं : जानकारी,  दर्शन               
                                                                                    * मिलन सिन्हा 
 जानकारी 
नेताजी के भाषण के बीच ही 
जब कुछ लोगों ने लगाया 
महंगाई विरोधी नारा 
तो नेताजी  को 
गुस्सा आ गया थोड़ा .
कहा उन्होंने कुछ जोर से,
जो कुछ हो रहा है सरेआम 
उससे भी आप 
क्यों रहते हैं बिल्कुल अनजान?
सब जानते हैं,
जहाँ कुछ चीजों की कीमत बढ़ी है 
वहीं कुछ चीजों की घटी भी है.
मनुष्य की जान,
उसका ईमान 
हो गया है कितना सस्ता,
क्या आपको 
यह भी नहीं है पता ?

 दर्शन 
नेताजी भगवान के 
बहुत बड़े भक्त हैं 
और गरीब जनता में 
भगवान  का दर्शन करते हैं .
इसी कारण वे 
गरीबों की संख्या 
कम करने के बजाए,
बढ़ाने में रूचि रखते हैं . 

   Enjoy Your Sunday. will meet again with Open Mind. All the Best.


Tuesday, September 18, 2012

कविता : जरूरी तो नहीं                                    
                                                                                                * मिलन  सिन्हा 

तुम जो चाहो सब मिल जाये, जरूरी तो नहीं 
तुम जो कहो सब ठीक हो, जरूरी तो नहीं .

दूसरों से भी मिलो, उनकी भी बातें सुनो 
वो जो कहें सब गलत हो, जरूरी तो नहीं .

सुनता हूँ यह होगा, वह  होगा,पर होता नहीं कुछ 
जो जैसा कहे, वैसा ही करे, जरूरी तो नहीं .

जिन्दगी के हर मुकाम पे  इम्तहान  दे रहा है आदमी 
इम्तहान  के बाद ही परिणाम मालूम हो, जरूरी तो नहीं .

संघर्ष से मत डरो, प्रयास हमेशा तुम करो  
हर बार तुम्हें हार ही मिले, जरूरी तो नहीं .

कहते हैं बेवफ़ाई एक फैशन हो गया है आजकल 
पर हर कोई यहाँ बेवफ़ा हो, जरूरी तो नहीं .

जनता यहाँ शोषित है, शासक भी है यहाँ शोषक 
हर शासक अशोक या अकबर हो, जरूरी तो नहीं .

जानता हूँ 'मिलन' का अंजाम जुदाई होता है 
पर हर जुदाई गमनाक हो,जरूरी तो नहीं .

Did you like the poem? Do comment. Will meet again with Open Mind.All the Best.

Sunday, September 16, 2012

हास्य व्यंग्य कविता: गांधीवादी परम्परा

                                                                                                      * मिलन सिन्हा 
हमारे  नेता जी काफी चर्चित थे 
जनता से
 जो काम करने को कहते थे 
उसे पहले 
खुद करते थे 
इस  मामले वे अपने को 
पक्के सिद्धान्तवादी-गांधीवादी कहते थे .
एक बार उन्होंने कहा,
हम गरीबी हटाकर रहेंगे 
अब गरीबी रहेगी या 
 हम रहेंगे .
 सिद्धान्त के मुताबिक  उन्होंने पहले 
अपनी गरीबी हटाने का प्रयास किया 
और जल्दी ही 
कई गाड़ियां खरीद लीं, 
चार-पांच मकान  बनवा लिया 
और भी न जाने 
क्या-क्या जोड़ लिया .
इस तरह उन्होंने
एक नयी परम्परा को जन्म दिया 
जिसका अनुसरण करते हुए 
अधिकांश नेता गांधीवादी (?) बन गए 
और पहले 
अपनी-अपनी गरीबी हटाने में जुट गए .


           How did you like it? Do comment & Enjoy your Sunday
                      Will meet again with Open Mind. All the Best.

Wednesday, September 12, 2012

कविता : रिश्तों की बुनियाद

                                                   
                                                        * मिलन  सिन्हा 


पहले खुद  पर ऊँगली उठा सको तो जानें 
पहले गैर के आंसू पोंछ सको तो जानें .

जानना समझना तो अभी बहुत कुछ है यहाँ 
कितने अज्ञानी है हम, पहले यही जान सको तो जानें .

भाई - भाई में झगड़ा, बाप-बेटे में मतान्तर 
 रिश्तों  की  बुनियाद अब क्या है बता सको तो जानें .

जिसे देखो वही पैसे  के पीछे भाग रहा है 
पैसा में ऐसा क्या है  समझा  सको तो जानें .

आँख  होते हुए भी बहुत लोग अंधे हैं यहाँ 
इन आंखवालों को नजर दे  सको तो जानें .

गोदाम भरे पड़े हैं, पर गरीब भूखा है यहाँ 
इन गरीबों  के लिए कुछ कर  सको तो जानें .

सुनता हूँ गरीबी, बेकारी, बेबसी अब नहीं रहेगी यहाँ 
हरियाली,खुशहाली से 'मिलन' कब होगा बता सको तो जानें . 

Enjoy the poem & post your comments, please. All the Best.

Sunday, September 9, 2012

दो हास्य व्यंग्य कविताएं : महंगाई और भ्रष्टाचार , आधुनिक परिभाषा

                                                              0 मिलन सिन्हा  
महंगाई और भ्रष्टाचार 
काफी समय से 
पति पत्नी के बीच 
चल रही थी तकरार 
पर कोई भी अपनी हार 
स्वीकारने को 
नहीं थे तैयार .
तभी पत्नी बोली,
तुम मुझे मत धमकाओ 
वरना, मैं महंगाई  बन जाऊंगी 
और तुम पर तो क्या 
पूरे देश पर छा जाऊंगी .
तैश में आकर तब 
पतिदेव ने फरमाया,
ठीक है, मैं भी तब 
भ्रष्टाचार बन जाऊंगा 
और केवल
अपने देश पर ही नहीं 
पूरे विश्व पर छा जाऊंगा .

आधुनिक परिभाषा 
एक आधुनिक पत्नी ने 
अपने पति को
'पतिव्रता' शब्द का
अर्थ यूं समझाया 
कि 'पति' से महीने   
दस दिन निराहार 'व्रत' रखवाया .
                                                      Enjoy your Sunday. All the Best.

Tuesday, September 4, 2012


कविता : अच्छा  लगता है                                                                   
                                                             -- मिलन सिन्हा 

कभी कभी खुद पर हंसना भी  अच्छा  लगता है
कभी कभी दूसरों पर रोना भी  अच्छा  लगता है।

हर चीज आसानी से मिल जाये सो भी ठीक नहीं 
कभी कभी कुछ खोजना भी   अच्छा  लगता है।

भीड़  से  घिरा  रहता  हूँ  आजकल  हर  घड़ी 
कभी कभी तन्हा रहना भी  अच्छा  लगता है।

हमेशा आगे देखने की नसीहत देता है  यहाँ हर कोई 
कभी कभी पीछे मुड़कर देखना भी अच्छा  लगता है।

एक खुली किताब है मेरी यह  टेढ़ी-मेढ़ी  जिंदगी 
कभी कभी  इसे दुबारा पढ़ना भी अच्छा लगता है।

 जिंदगी  की   सच्चाइयां   तो  निहायत  कड़वी है 
कभी कभी सपने में जीना भी अच्छा  लगता है।

'मिलन'  तो  बराबर  ही  नियति  रही है मेरी 
कभी कभी  बिछुड़न  भी   अच्छा  लगता है।


                                                         Hope, you enjoyed the poem. All the Best.

Sunday, September 2, 2012

हास्य व्यंग्य कविता : आधुनिकता के नए रंग

                                                 * मिलन  सिन्हा   

सावन की सुहानी रात थी 
पति पत्नी की बात थी 
कहा, पति ने बड़े प्यार से 
देखो, प्रिये  
कल मुझे आफ़िस जल्दी है जाना 
वहां बहुत काम पड़ा है 
सब मुझे ही है निबटाना .
प्लीज ,जाने मन 
कल, सिर्फ कल 
बना लेना अपना खाना 
इसके लिए 
मैं तुम्हारा  'ग्रेटफूल'  रहूँगा  
आगे फिर कभी 
तुम्हे डिस्टर्ब नहीं करूँगा .
पत्नी के चेहरे का रंग 
तेजी से बदल रहा था .
गोरा से पीला 
फिर लाल  हो रहा था
जबान अब उसने खोली 
तुनक कर फिर बोली .
'ग्रेट'  'फूल ' तो तुम हो ही 
ग्रेटफूल  क्या रहोगे 
मेरा  मूड  बिगाड़ने  के लिए 
बस यही  सब तो करोगे .
राम जाने,
यह तुम्हारा  आफ़िस  है 
 या है मेरी सौत 
लगता है इसी के कारण 
होगी किसी दिन मेरी मौत .
मैं पूछती हूँ ,
जब अलग अलग थी
तुम्हारी  हमारी राह 
तो फिर तुमने 
क्यों किया मुझसे निकाह .
क्या सीखूँ  मैं अब 
डिस्को डांस और माडर्न संगीत 
दुर्भाग्य है हमारा 
जो तुमसा मिला मनमीत 
जो न समझे 
क्या है कला, क्या है संस्कृति .
तुम जैसे पतियों की तो 
भ्रष्ट हो गयी है मति 
इसी कारण अपने देश की 
हो रही है दुर्गति .
पर , इस  तरह अब नहीं चलेगा काम 
हमें ही करना पड़ेगा 
कुछ न कुछ इन्तजाम .
देखना, हम पत्नियां अब 
ऐसी संस्था बनायेंगी 
जो दफ्तरों में सुधार लायेगा
देर से दफ्तर खुलवाएगा
जल्दी बंद भी करवाएगा .
हर महीने
पांच पांच  सी.एल  भी दिलवाएगा
पत्नी के बीमारी के नाम पर
सिक लीव  की व्यवस्था करवाएगा .
बॉस की डांट से भी
तुम पतियों को बचाएगा
बॉस की पत्नी से
 बॉस को खूब  डंटवाएगा .
और भी बहुत कुछ करेगा-करवाएगा
इस तरह पति-पत्नी के रिश्ते  को
खूब मधुर बनाएगा
तभी तो आधुनिकता का परचम
हर जगह लहराएगा !

                                                 Enjoy Your Sunday. All the Best.

Wednesday, August 29, 2012

IN SEARCH OF 'BLACK HOLES'

POEM                                                                              -By Milan K. Sinha
                         
                                  He was one
                            who always took inspiration
                            from Skyscrapers and Eiffel Towers
                            and kept on gaining new heights.
                            And I was one
                            who persisted with the mission
                            in search of drains and slums
                            in search of scraps of all kinds
                            to give them a new shape,
                            to infuse life into them.
                           Today,
                           He is discovering
                           'Black Holes" in space
                           and I am 
                           trying to discover
                           'Black Holes' in our society
                           like Gandhi and Teresa!


                         Shall await your comments, as ever.  All the Best.

Sunday, August 26, 2012

हास्य व्यंग्य कविता : पॉपुलर कारपोरेट मंत्र

                                                                  -मिलन सिन्हा 

सुबह से हो जाती थी शाम 
पर,                                                                            
हर दिन  रहता था वह  परेशान. 
मामला ओफिशिएल था 
कुछ -कुछ ,
कांफिडेंसिएल  था. 
इसीलिए 
किसी से कुछ न कहता था 
खुद ही चुपचाप , 
 सबकुछ  सहता था. 
देखी  जब मैंने  उसकी दशा 
 सुनी गौर  से 
उसकी समस्या, 
सब कुछ समझ में आ गया .
असल बीमारी का 
पता भी चल गया. 
रोग साइकोलोजिकल  था 
पर, समाधान 
बिल्कुल प्रक्टिकल  था. 
मैंने  उसे सिर्फ़  एक  मंत्र  सिखाया 
जिसे उसने 
बड़े मन से अपनाया. 
आफ़िस  में अब उसे 
नहीं है कोई टेंशन, 
सेलेरी को अब वह 
समझने लगा है पेंशन. 
"झाड़ने " को वह  अब 
"कला " मानता है .
अपने मातहतों  को 
खूब झाड़ता  है. 
और अपने बॉस के फाइरिंग को 
चैम्बर से  निकलते ही 
ठीक से "झाड़ता " है .

"झाड़ने " को वह  अब 
"कला " मानता है I 


Enjoy your Sunday. All the Best.