Wednesday, May 22, 2019

मोटिवेशन: संघर्ष और सफलता

                                                           - मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर ... ...
समय-समय पर अखबारों व अन्य समाचार माध्यमों से यह खबर मिलती रहती  है कि कैसे किसी छात्र या छात्रा ने तमाम आर्थिक, सामाजिक और शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद पढ़ाई या खेलकूद या किसी अन्य क्षेत्र में असाधारण उपलब्धि हासिल की है. रिपोर्ट में उनके अनथक संघर्ष का विवरण भी रहता है. हाल ही सीए (चार्टर्ड एकाउंटेंसी) फाइनल परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले एक लड़के की चर्चा अखबारों में थी कि कैसे कोटा निवासी उस दर्जी के बेटे ने संघर्ष के रास्ते यह मुकाम अर्जित किया. इसके विपरीत आपके आसपास भी ऐसे कई विद्यार्थी मिल जायेंगे जो अध्ययन एवं मेहनत से भागते हैं. इससे बचने के लिए कोई-न-कोई बहाना बनाते हैं. उन्हें आराम की जिंदगी जीने की तलब तो होती है, पर उसके लिए कुछ करना नहीं चाहते. क्या ऐसे विद्यार्थी जीवन में सफलता, सुख और शांति हासिल कर सकते हैं ? क्या उनका जीवन सार्थक कहा या माना जाएगा ? क्या उनकी यह आदत उनके आत्मविश्वास और आंतरिक क्षमता को कमजोर  नहीं करेगी ?   

प्रसिद्ध कवि जगदीश गुप्त की यह पक्तियां कि 'सच हम नहीं सच तुम नहीं सच है सतत संघर्ष ही / संघर्ष से हट कर जिए तो क्या जिए हम या कि तुम....'  या अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट के ये शब्द कि  'इतिहास आसान जीवन जीने वाले को याद नहीं रखता, इसलिए आरामतलबी को छोड़ते हुए हमें संघर्ष कर उससे प्राप्त सुख का भोग करना चाहिए' इस बात को बखूबी रेखांकित करते हैं कि जीवन में संघर्ष न हो तो जीवन में सच्चे आनंद का सुख हम नहीं भोग सकते. ज्ञानीजन यह भी कहते हैं कि जीवन में संघर्ष और सफलता लगातार आगे-पीछे चलते रहते हैं. 

आप भी मानेंगे, अगर कोई भी संघर्ष के रास्ते जीवन में सकारात्मक लक्ष्य की ओर खुशी-खुशी और मजबूती से चल पड़ें तो कोई कारण नहीं कि उन्हें अपेक्षित कामयाबी, खुशी, सुख और सकून न मिले. जरा सोचिये, 29 मई 1953 को माउंट एवेरेस्ट पर पहली बार विजयी पताका लहराने वाले न्यूज़ीलैंड के महान पर्वतारोही एडमंड हिलेरी एवं उनके नेपाली साथी शेरपा तेनजिंग नोरगे ने कितने मजबूत इरादों एवं कठिन परिश्रम से वह सुखद कीर्तिमान बनाया होगा. किस कठिनतम परिस्थिति में उन्होंने किस दिलेरी से अनजाने दुर्गम पहाड़ों से होते हुए अंततः विश्व की सर्वोच्य चोटी को फतह किया होगा. उस वक्त हिलेरी की उम्र मात्र 34 वर्ष और शेरपा तेनजिंग की 39 साल थी. दिलचस्प बात यह थी की शेरपा तेनजिंग को संघर्ष के उस महानतम मंजिल पर विजय हासिल करने पर इतनी खुशी मिली  कि उन्होंने 29 मई को ही अपना जन्मदिन मानने, बताने और मनाने भी लगे. दरअसल शेरपा तेनजिंग को अपना वास्तविक जन्म साल  तो ज्ञात था, लेकिन जन्मदिन नहीं. 

हमारी आजादी के संग्राम में जिन लोगों ने असाधारण भूमिका निभाई उनमें से यहां एक विभूति की चर्चा करें तो संघर्ष की महत्ता को समझना आसान होगा. वे हैं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक.     

'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे मैं लेकर रहूँगा' के दृढ़ संकल्प से युक्त तिलक ने सुखमय जिंदगी का परित्याग कर देश की आजादी के लिए कठिन संघर्ष का मार्ग अपनाया. तिलक गणित, इतिहास, संस्कृत, कानून और खगोल विज्ञान के ज्ञाता थे. वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता थे जिनसे ब्रिटिश सरकार खौफ खाती थी. संघर्ष के उन्हीं दिनों में उन्होंने लोगों को जागृत करने के लिए दो अखबारों का प्रकाशन शुरू किया, जो आगे चलकर लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ. स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष में लिखे गए उनके लेखों के कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा. 52 वर्ष की उम्र में (वर्ष 1908) ब्रिटिश सरकार ने उन्हें प्रसिद्द क्रांतिकारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी के समर्थन में आगे आने के लिए बर्मा (आज के म्यंमार) के कुख्यात मांडले जेल में छह साल  के कारावास में भेज दिया. लेकिन जैसे सोना आग में तपकर और निखरता है, उसी प्रकार बाल  गंगाधर तिलक ने उस कठिन परिस्थिति को चुनौती मानकर उस दौरान 'गीता रहस्य' नामक प्रसिद्ध किताब लिख डाली, जिसका बाद में अनेक भाषाओँ  में अनुवाद भी हुआ. संघर्ष के उस काल खंड में ऐसा भी वक्त आया जब तिलक की पत्नी का देहांत हो गया जिसकी सूचना उन्हें बाद में  दी गई. परिणामस्वरुप  वे पत्नी के अंतिम संस्कार में शामिल तक नहीं हो पाए. लोकमान्य तिलक ने लोगों को सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से जोड़ने और जागृत करने के लिए 'गणपति उत्सव' तथा  'छत्रपति शिवाजी उत्सव' की शानदार शुरुआत की और स्वामी विवेकानंद के इस उक्ति को बखूबी साबित किया  कि 'जितना बड़ा संघर्ष होगा, जीत उतनी ही शानदार होगी.'     
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Tuesday, April 16, 2019

MOTIVATION : LIFE IS SIMPLE, DON'T MAKE IT COMPLEX

                                                               - MILAN K SINHA, Motivational Speaker...


It is said that simple is really beautiful and very encompassing. Living a simple life gives you peace, prosperity and happiness. Leo Tolstoy says, “There can’t be any greatness and excellence where there is no simplicity, goodness and honesty.” Just think, who knows you better who you are?  Then what is the fun in showing off what you are not and in the process make your own life unnecessarily complex and miserable.  Confucius also says, “Life is really simple, but we tend to make it complex.”

Since our childhood, we have been listening about a famous saying: “Simple Living and High Thinking.” Across the world we find many great persons in each field of activity who lived a very simple life, yet created history by their amazing deeds. The life of Mahatma Gandhi to Albert Einstein amply vindicates this fact. Then why a large number of people opt for a complex life leaving the simple one, knowingly or unknowingly, and in the process waste lots of time, money and energy despite knowing it pretty well that there is a  direct link between uneasy living and growing stress? Any way, it is never too late to mend. Just think over this issue and review your day’s engagements to lessen the negative ones and increase the positive engagements on a continuous basis.

Mahatma Gandhi says, “A man is but the product of his thoughts. What he thinks, he becomes.” It being so, it is always better to think positive, act straight and simple to have lesser anxiety and greater happiness.

In this age of liberalisation when everything is market driven, when information gets precedence over ideas most of the time, when machine is more important than man, it is all the more necessary to keep your life as less complicated and dependent on external factors as possible to ensure better inclusive growth for the society of which you are also an important component.


It is equally worth considering why people of India respect and treat people like Mahatma Gandhi, Jay Prakash Narayan, Baba Amte and Netaji Subhas Chandra Bose as most popular and inspirational leaders despite the fact that they were not the President, Prime Minister, Vice-President, Governor, Chief Minister or Minister? It was primarily because these great men were not only extraordinary in their ideas but also in practice what they preached. Moreover, they lived a very simple, fair and transparent life all through. They always worked with positive thoughts for the good of the common man and disadvantaged section of the society. 

So, live simply to enjoy the life greatly.              (hellomilansinha@gmail.com)

      Will meet again with Open Mind. All The Best.      

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Friday, March 15, 2019

मोटिवेशन: समय प्रबंधन से मिलेंगे अच्छे अंक

                                                                        - मिलन  सिन्हामोटिवेशनल स्पीकर... ...
स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं को मोटिवेट करने के क्रम में मैं "3 आर" को ठीक से साधने की बात करता रहा हूँ. यहाँ "3 आर" का मतलब रीडिंग, रिटेंशन और रिप्रोडक्शन से है. आम तौर पर यह पाया गया है कि पढ़ने, दिमाग में रख पाने तथा इम्तिहान में उसका उपयोग करने का अनुपात यानी  "3 आर"  का अनुपात 10 : 6 : 3 रहता है. इसका मतलब यह हुआ कि आपने 10 पेज पढ़ा, 6 पेज दिमाग में अंकित हुआ और मात्र 3 पेज के बराबर परीक्षा में लिख पाए. इसमें भी तारतम्य की गड़बड़ी रहती है सो अलग. यह कहने की जरुरत नहीं कि अच्छे विद्यार्थी का यह अनुपात यकीनन बेहतर होता है और तारतम्य भी. तो अब सवाल उठता है कि "3 आर" अनुपात को अच्छे ढंग से साधने के लिए वास्तव में क्या करना चाहिए?

पहले तो तन्मयता से पढ़ने की आदत डालनी चाहिए. तन्मयता से पढ़ने का मतलब यह है कि आप जब पढ़ने बैठते हैं, उस समय पूरे मनोयोग से आप उस चैप्टर को पढ़ें. पढ़ते वक्त आपका ध्यान आप जो पढ़ रहे हैं, मुख्यतः उसपर रहे. कोई भी दूसरा काम आपके ध्यान को बाधित नहीं कर पाए. कहने का अभिप्राय यह कि महाभारत में वर्णित श्रेष्ठ धनुर्धर पांडव पुत्र अर्जुन की तरह एकाग्रचित्त हो कर कार्य करें. अगर दो घंटे लगातार पढ़ने का मन बनाकर बैठते हैं तो उन दो घंटों में मोबाइल को साइलेंट मोड में कर लें और उसे पढ़ाई के टेबल से दूर रखें. ऐसे ही दूसरे अवरोधों से बचें. पढ़ने के लिए सुबह का समय कई कारणों से बेहतर माना जाता है. देखा गया है कि शाम तक जो विद्यार्थी दिनभर के लिए निर्धारित पढ़ाई कर लेते हैं, उन्हें रात में नींद भी अच्छी आती है. कारण सोने से पहले वे तनावमुक्त रहते हैं. इसके विपरीत दिनभर दूसरे क्रियाकलाप में व्यस्त रहनेवाले विद्यार्थी के लिए देर रात तक पढ़ने का प्रेशर रहता है, जब कि दिनभर के कार्य से शरीर थका रहता है और आराम खोजता है. ऐसे विद्यार्थियों के अस्वस्थ होने की संभावना भी ज्यादा रहती है. इसके अलावे एक और बात का ध्यान रखना लाभदायक होता है. शोरगुलवाले स्थान से अलग शांत माहौल में पढ़ने से एकाग्रता में खलल नहीं पड़ता है, फलतः चीजों को समझना और याद रखना आसान होता है. इस तरह एक बार विषय पर फोकस करके पढ़ने की आदत हो जाती है तो फिर आगे उसे जारी रखना आसान भी होता जाता है. 

पढ़ी हुई बातों को दिमाग में संजो कर रखने का अर्थ है कि वे बातें आपके दिमागी हार्ड डिस्क में ठीक से अंकित हो जाय. इसके लिए अपने दिमाग को उन बातों के स्वागत के लिए तैयार करने की जरुरत होती है. पढ़ी हुई बातों को दिमाग में अच्छी तरह सहेज कर रखना बहुत फलदायी साबित होता है. इससे जब भी जरुरत हो वह हमारे दिमागी स्क्रीन पर तुरत दिखने लगता है. कहते हैं "प्रैक्टिस मेकस ए मैन परफेक्ट" अर्थात अभ्यास आदमी को पूर्णता प्रदान करता है. जिन चीजों को तन्मयता से एक बार समझ पढ़ा-समझा, उसे छोटे-छोटे अंतराल में अगर फिर पढ़ और समझ लिया जाय, बिना देखे फिर उसको लिखने का अभ्यास कर लें, किसी दूसरे को वही बातें बता दें, पढ़ा दें, सिखा दें, तो यकीन मानिए आपके दिमाग में वह दृढ़ता से अंकित हो जाता है. कविवर वृंद ने सही कहा  है कि "करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान." लिखने के सतत अभ्यास से आपको यह भी पता चल जाता है कि एक प्रश्न का उत्तर लिखने में कितना समय लगता है, जिससे कि परीक्षा के समय सब कुछ बेहतर ढंग से संपन्न हो सके. 

अब बात करते हैं किसी भी परीक्षा में अपेक्षानुसार या तैयारी के अनुरूप परफॉर्म करने की यानी पढ़ी और समझी हुई बातों की बुनियाद पर प्रश्नों का उत्तर लिखने की. इसके लिए पहले तो आपको शारीरिक एवं मानसिक रूप से संयत, संतुलित और शांत रहने की आवश्यकता होगी. अंतिम समय में पढ़कर या रटकर कुछ बेहतर हासिल करने की कवायद इच्छित फल नहीं देता है. इसके उलट ज्यादातर मामलों में आपका कनफूजन बढ़ जाता और साथ में उत्तेजना भी. परिणामस्वरूप, पहले जो कुछ अच्छे से पढ़ा है, उसे भी याद रखना मुश्किल लगने लगता है. फिर तो परीक्षा हॉल में नियत समय में सारे प्रश्नों का उत्तर देना नामुमकिन हो जाता है, जब कि प्रश्नों का उत्तर आपको मालूम होता है. इसलिए हर विषय की परीक्षा से पहली रात को जल्दी सो जाएं, 10 बजे से 11 बजे के बीच. सबेरे उठकर कर सामान्य दिनचर्या पर अमल करें. परीक्षा सेंटर पर समय से थोड़ा पहले पहुंचें. प्रश्नपत्र मिलने पर सभी प्रश्नों को पहले अच्छी तरह पढ़ें और हर प्रश्न के उत्तर पर कितने अंक मिलेंगे उस पर ध्यान देकर समय प्रबंधन की रुपरेखा बना लें. इसमें सभी प्रश्नों का जवाब लिखने के बाद अंत में 10-15 मिनट का समय रिवीजन के लिए रखें. अब उन सवालों को हल करते चलें जिन्हें कम समय में कर सकते हैं. जैसे-जैसे आप सवाल हल करते जायेंगे, आपका आत्मविश्वास बेहतर होता जाएगा और साथ में आपका दिमागी कंप्यूटर ज्यादा प्रभावी ढंग से काम भी करने लगेगा. रिप्रोडक्शन प्रक्रिया बेहतर होगी और अंतिम परिणाम भी. 
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Friday, March 1, 2019

मोटिवेशन: प्लान करके चलें, सपनों को साकार करें

                                                   - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
स्कूल, कॉलेज और  यूनिवर्सिटी में आपने भी शिक्षकों को यह कहते सुना होगा कि बेहतर परिणाम पाना चाहते हैं तो प्लान करके चलें. यही बात कॉरपोरेट जगत में बॉस और विशेषज्ञों भी कहते पाए जाते हैं. किसी खास समय जैसे कि इम्तिहान के वक्त हर विद्यार्थी आम दिनों से कुछ ज्यादा प्लान करके चलता है. बुद्धिमान और अच्छा रिजल्ट करनेवाले तो सामान्य  तौर पर बराबर ही प्लान करके चलते हैं. सच कहें तो प्लानिंग उनके दैनंदिन जिन्दगी का अभिन्न अंग हो जाता है; आदत का हिस्सा बन जाता है. वे इसके लिए हमेशा जागरूक रहते हैं. कल कौन-कौन से काम कब और कैसे करना है, उसे वे पहले से ही सूचीबद्ध कर लेते हैं और कमोबेश उसी के अनुसार कार्य संपादित करते हैं. उन्हें आप कदाचित ही फायर फाइटिंग मोड में देखेंगे. जब कि प्लान करके नहीं चलनेवालों को आप अधिकतर समय फायर फाइटिंग मोड में ही पायेंगे अर्थात घर में आग लग जाने पर उसे बुझाने के लिए भागमभाग करना, हो-हल्ला मचाना, अस्त-व्यस्त रहना. ऐसे लोग कम सफल और कम उत्पादक तो होते ही हैं, अनावश्यक तनाव में भी रहते हैं. और सभी जानते हैं, बराबर तनाव में रहना सेहत के लिए बिलकुल ही ठीक नहीं. इसके बहुआयामी दुष्प्रभाव हैं.

अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों की प्लानिंग से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. कैसे सब कुछ निर्धारित समय में पूरी सूक्ष्मता एवं गुणवत्ता के उच्चतम मानकों के साथ होता है जिससे काउंट डाउन ख़त्म होते ही अन्तरिक्ष यान अपने गंतव्य की ओर चल पड़ता है. कितनी प्लानिंग से सब कुछ आगाज से अंजाम तक पहुंचाया जाता है; एक बड़ी टीम में कितने लोग किस तरह प्लान करके चलते हैं कि एक नियत तिथि को सब कुछ सफलतापूर्वक संपन्न किया जाता है. वास्तव में,  हर प्रोजेक्ट प्लानिंग अपने आप में एक अनोखी एवं विचार समृद्ध प्रक्रिया होती है.

बेंजामिन फ्रैंकलिन कहते हैं, ‘अगर आप प्लान करने में असफल रहते हैं तो आप वाकई असफल होने का प्लान कर रहे हैं.’ सपनों को साकार करने के लिए तथा अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हमारे युवा जितनी मेहनत और लगन से लगे रहते हैं, उन्हें फ्रैंकलिन की बात की अहमियत अच्छी तरह समझने की आवश्यकता है. 

हम यह सब जानते और मानते हैं कि जहां भी संसाधनों की किल्लत रहती है, चाहे वह समय, उर्जा, धन, अवसर, मशीन, श्रमिक आदि ही क्यों न हो, वहां प्लान करके चलना निहायत जरुरी है. दूसरे शब्दों में कहें तो जब भी, जहाँ भी सीमित संसाधनों से एक नियत समयावधि में किसी भी कार्य को संपन्न करने की चुनौती होती है, तब-तब योजना की अनिवार्यता और स्पष्ट होती है. लेस्टर राबर्ट बिटल तो  कहते हैं, ‘अच्छी योजना अच्छे निर्णय का द्योतक है जिससे सपनों को साकार करना आसान हो जाता है.’ 

युवाओं के साथ -साथ यह बात नौकरी पेशा लोगों सहित उन सब पर लागू होता है, जो सहज और सुचारू ढंग से अपने दैनंदिन जीवन में अपने लक्ष्य को हासिल करना चाहते हैं. यह तब और अहम हो जाता है जब प्रतिस्पर्धा के इस युग में युवाओं को कई बार मल्टी-टास्किंग से रूबरू होना पड़ता है यानी एक साथ एकाधिक कार्य करने का प्रेशर होता है. तभी तो प्रसिद्ध फुटबॉल कोच पॉल ब्रायंट कहते हैं, ‘योजना बनायें, उसे ईमानदारी से अमल में लायें और फिर देखें कि आप कितने सफल हो सकते हैं. अधिकतर लोगों के पास कोई योजना नहीं होती. इसी कारण उन्हें हराना आसान  होता है.’ 

तो प्रश्न यह है कि विद्यार्थी इम्तिहान के इस मौसम में कैसे प्लान करें कि वे अपेक्षा के अनुरूप परीक्षा में परफॉर्म कर सकें ? 

परीक्षा से पहले अब जितना दिन बचा है और किसी दो विषयों की परीक्षा के बीच जो अंतराल है, उस दौरान जितना घंटा मिलता है, सबको जोड़ लें. अब उसमें से सोने के औसतन 7-8 घंटे तथा अन्य दैनिक दिनचर्या के लिए 3-4 घंटे  रोज के हिसाब से निकालने के बाद जितने घंटे बचते हैं, उसे विषय विशेष की जरुरत के मुताबिक़ आबंटित कर उस प्लान पर अमल करना शुरू करें. इस प्लान में कुछ घंटे खाली भी रखें यानी प्लान में थोड़ा लचीलापन रखें जिससे कि सभी विषयों पर यथोचित ध्यान दिया जा सके. ऐसे बनाए गए प्लान को पहले दो -तीन तक अमल में लाने के बाद आपकी  शारीरिक घड़ी एवं मन-मानस इस प्लान से एडजस्ट हो जाती है. फिर तो आगे उस प्लान के अमल से होनेवाले फायदे आपको खुद पता चलने लगते हैं और आपके उर्जा, उत्साह और उमंग में उछाल स्वतः आता रहता है. निःसंदेह, प्लान करके चलने की मानसिकता परीक्षा हॉल में भी आपको बहुत लाभ पहुंचाता है.  
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Friday, February 15, 2019

वेलनेस पॉइंट: युवा कैसे करें तनाव प्रबंधन?

                                          मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 
वास्तव में हमारे युवाओं, खासकर विद्यार्थियों को सुबह से शाम तक  तनाव से परेशान देखना आम बात हो गई है. यह सही है क्यों कि निरंतर बढ़ते प्रतिस्पर्धा के मौजूदा दौर में उनके लिए अपेक्षा, उत्पादकता, आनंद आदि के बीच तालमेल बिठाना कठिनतर होता जा रहा है. परिणामस्वरूप, वे अक्सर थके-हारे, मायूस और अस्वस्थ नजर आते हैं. इससे उनका उत्साह, आत्मविश्वास और उत्पादकता तो प्रभावित होता है, इसका नकारात्मक असर पारिवारिक सुख-शान्ति पर भी पड़ता है. 

दरअसल, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो तनावग्रस्त रहने और उसी अवस्था में कार्य करते रहने की बाध्यता के कारण ऐसे युवा तनाव-जनित अनेक बीमारियों के शिकार भी हो रहे हैं, और वह भी बड़ी संख्या में. इन बीमारियों में सिरदर्द, माइग्रेन, डिप्रेशन से लेकर ह्रदय रोग, मधुमेह, कैंसर आदि शामिल हैं. स्वाभाविक तौर पर यह किसी भी व्यक्ति और उनके परिवार के लिए सुखद स्थिति नहीं कही जा सकती. तो फिर सवाल है कि बिना किसी डॉक्टर के पास गए और बिना दवाइयों के सेवन के इस स्थिति से कैसे पार पाया जाय.

जोर देने की जरुरत नहीं कि इन सभी स्वास्थ्य समस्याओं का एक मात्र सटीक समाधान हमें योग से जुड़ कर मिल सकता है. योग के विषय में विश्व प्रसिद्ध ‘बिहार योग विद्द्यालय, मुंगेर’ के संस्थापक स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने बहुत सही कहा है, “योग मानवता की प्राचीन पूंजी है, मानव द्वारा संग्रहित सबसे बहुमूल्य खजाना है. मनुष्य तीन वस्तुओं से बना है – शरीर, मन व आत्मा. अपने शरीर पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण और अपने अन्तरात्मा की आवाज को पहचानना – इस प्रकार शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक इन तीनों अवस्थाओं का संतुलन ही योग है.  योग एक ऐसा रास्ता है, जो मनुष्य को स्वयं को पहचानने में मदद करता है. मानव शरीर को स्वस्थ और निरोग बनाता है एवं मनुष्य को बाहरी तनावों, शारीरिक विकारों से मुक्ति दिलाता है जो मनुष्य की स्वाभाविक क्रियाओं में अवरोध उत्पन्न करते हैं.  योग द्वारा मनुष्य अपने मन तथा व्यक्तित्व की अवस्थाएं तथा दोषों का सामना करता है.  यह मनुष्य को उसके संकुचित और निम्न विचारों से मुक्ति दिलाता है... …”

कहने का अभिप्राय यह कि योग अर्थात आसन, प्राणायाम,  ध्यान आदि का विज्ञान कहता है कि हम योग से जुड़कर अपने शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षमताओं के बीच बेहतर संतुलन कायम कर न केवल खुद को आज और भविष्य में भी ज्यादा स्वस्थ, उत्पादक और खुश रख सकते हैं,  बल्कि अपने परिवारजनों को सही रूप में योग से जुड़ने और उसके असीमित सकारात्मक पहलुओं को जानने –समझने को प्रेरित कर सकते हैं. इस तरह हम खुद के अलावे अपने परिवार, समाज और देश को सही अर्थों में मजबूत, समर्थ, संपन्न और खुशहाल बना सकते हैं. 

हां, इसे मूर्तरूप देने के लिए स्वामी विवेकानन्द के इस कथन कि “सब शक्ति हमारे अन्दर है. हम सब कुछ कर सकते हैं” पर पूर्ण विश्वास करते हुए पूरी आस्था और निष्ठा से किसी योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में योगाभ्यास प्रारंभ करना मुनासिब होगा. 

सूर्योदय के आसपास शौच आदि से निवृत होकर पहले आसन, फिर प्राणायाम और अंत में ध्यान – इस क्रम में पूरे योगाभ्यास को 30-40 मिनट में भी पूरा किया जा सकता है. 

आसन में पवनमुक्तासन से शुरू करके सूर्य नमस्कार तक की क्रिया की जा सकती है. सच कहें तो सूर्य नमस्कार का 8-10 राउंड अपने-आप में सम्पूर्ण आसन अर्थात व्यायाम है. इसके विकल्प के रूप में कुछ देर के सामान्य वार्मअप एक्सरसाइज के बाद पवनमुक्तासन श्रेणी के चार-पांच आसन जैसे ताड़ासन, कटि-चक्रासन, भुजंगासन, शशांकासन, नौकासन नियमित रुप से करें, तब भी अपेक्षित लाभ मिलेगा. 

प्राणायाम यानी ब्रीदिंग एक्सरसाइज में अनुलोम-विलोम, कपालभाती, उज्जायी, शीतली और भ्रामरी से शुरू कर सकते हैं. इसके बाद ध्यान मुद्रा यानी मेडिटेशन में कम-से-कम 5-10 मिनट बैठें. 

संक्षेप में कहें तो 10-15 मिनट का आसन, 10-15 मिनट का प्राणायाम और 5-10 का ध्यान अगर नियमितता, तन्मयता और निष्ठा से करें तो अप्रत्याशित लाभ के हकदार बनेंगे.      (hellomilansinha@gmail.com)

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Tuesday, February 5, 2019

मोटिवेशन: परीक्षा तो जीवन का हिस्सा है

                                                   - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ...
कुछ ही दिनों में सीबीएसइ की दसवीं तथा बारहवीं की परीक्षा सहित प्रादेशिक बोर्ड की परीक्षाएं भी   प्रारंभ हो रही हैं. छात्र–छात्राएं तैयारी में पूरी तरह जुट गए हैं. अभिभावक–शिक्षक की व्यस्तता भी बढ़ गई है. सही है. 

जरा सोचें कि परीक्षा आखिर है क्या, तो पायेंगे कि यह तो वाकई विद्यार्थियों के धैर्य, दिमागी संतुलन, ज्ञान एवं समय प्रबंधन का एक टेस्ट मात्र है.  दूसरे शब्दों में, उन्होंने अबतक जो कुछ पढ़ा है, सीखा है, जाना है, समझा है, और अगले कुछ दिनों तक उसमें जो कुछ जोड़ेंगे, उसके आधार पर परीक्षा में एक नियत समय सीमा के भीतर पूछे गए प्रश्नों का सटीक जबाव देना है.

कुछ लोग परीक्षा को ‘पर इच्छा’ भी कहते हैं. अगर यह सही है तो  परीक्षा में सब कुछ अपनी इच्छा के अनुरूप हो, यह जरूरी  नहीं. इसलिए, परीक्षा के पहले यह अपेक्षित है कि कूल -कूल और नार्मल रहते हुए यथासाध्य प्रयास करते रहें. इसके लिए संतुलित जीवनशैली अपनाकर खुद को फिट एवं जीवंत बनाए रखना बहुत लाभकारी होता है. हालांकि इस दौरान अमूमन यह देखने में आता है  कि अध्ययन के नार्मल रूटीन के साथ -साथ छात्र-छात्राओं की अन्य सामान्य दिनचर्या तक अस्त-व्यस्त हो जाती है. कहने का मतलब  यह  कि उन्हें न तो समय पर खाने की फ़िक्र रहती  है और न ही समय पर सोने  की,  जब  कि  परीक्षा की पूरी अवधि में  खाने और सोने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है, जितना कि पढ़ने पर.  ऐसा  इसलिए कि यथासमय आहार व नींद से  दूर रहने पर वे पर्याप्त शारीरिक एवं मानसिक शक्ति से युक्त नहीं रह सकते हैं. इसके एक दुष्प्रभाव  के रूप में उनमें नकारात्मक विचारों में वृद्धि हो जाती है  और वे अचानक ही खुद को अनेक समस्याओं से घिरे पाते हैं; परीक्षा के दौरान बीमार पड़ने की संभावना भी बढ़ जाती है; और फिर परीक्षा में बेहतर परफॉर्म करना कठिन हो जाता है. तो क्या करें?

रात में जल्दी सोयें और सुबह जल्दी उठें. नित्यक्रिया से निवृत होकर कम-से-कम 15 मिनट वार्मअप एक्सरसाइज एवं प्राणायाम –ध्यान कर लें.  सुबह नाश्ता खूब बढ़िया से करें यानी पौष्टिक आहार लें. सच पूछें तो घर में  उपलब्ध एवं तैयार पौष्टिक नाश्ते से  प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट, विटामिन, मिनिरल आदि पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है जो हमें शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए काफी है. दोपहर के खाने में चावल या रोटी के साथ दाल, मौसमी हरी सब्जी, दही, सलाद का सेवन करें. अपने आहार  में मौसमी फलों को भी शामिल करें. रात के खाने को सादा एवं सबसे हल्का रखें और  नौ बजे तक खाना खा भी लें.  हाँ, जंक, बाजारू एवं प्रोसेस्ड चीजों से बचने की हरसंभव कोशिश करें. डिनर पार्टी आदि से दूर रहें. परीक्षा के दिन यथासंभव सादा एवं सुपाच्य भोजन करें, मसलन दाल–रोटी, दही–चूड़ा, खिचड़ी, इडली-सांभर  आदि. खाना खूब चबाकर खाएं और शरीर को बराबर हाइड्रेटेड रखें, अर्थात पानी पीते रहें.

चिकित्सा विज्ञान कहता है कि रात में अपर्याप्त नींद के कारण हमारा स्वास्थ्य खराब हो जाता है. ऐसे लोगों का स्ट्रेस हॉर्मोन्स काफी बढ़ जाता है जिसके चलते वे एकाधिक रोगों की चपेट में आ जाते हैं. लिहाजा, रात में सात–आठ घंटा जरुर सोयें. रात की अच्छी नींद सुबह आपके लिए ताजगी, उमंग व उत्साह का उपहार लेकर आती है. हाँ, सोने से पहले  अपना  मोबाइल बंद कर लें तो उत्तम, नहीं तो कम से कम साइलेंट मोड पर जरूर कर लें. मोबाइल को सोने के स्थान से दूर रखें. एक और बात. ध्वनि तथा प्रकाश अच्छी नींद को बाधित करते हैं.  सोने से पहले इसका  ध्यान रखें तो बेहतर. मौका मिले तो दोपहर में भी थोड़ी देर (घंटा भर) सो लें – रीफ्रेशड फील करेंगे. 

सार-संक्षेप यह कि परीक्षा से पहले अब जितने दिन शेष है, उसका बेहतर उपयोग करें. किस विषय में और कितना समय दे सकते हैं, उसका सही आकलन कर एक स्मार्ट कार्ययोजना बनाकर उस पर अमल करें. जो समय बीत गया, उसकी चिंता इस वक्त कतई न करें. प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन ने लिखा है न, 'जो बीत गयी सो बात गयी ….'  बेहतर तो यह है कि अब जो कर सकते हैं  उसी पर फोकस करें.  यथासाध्य और यथासंभव रीविजन करें, लिखने का अभ्यास भी करें.  कहते हैं न, ‘प्रैक्टिस मेक्स ए मैन परफेक्ट’. फार्मूला, महत्वपूर्ण पॉइंट्स आदि पर विशेष ध्यान दें, उन्हें अंडरलाइन करें, हाईलाइट करें.

परीक्षा जैसे नाजुक अवसर पर यह भी देखा  गया है कि ज्यादातर स्टूडेंट यह सोच-सोच कर  परेशान  रहते हैं कि दोस्त क्या पढ़ रहे हैं, क्या कर रहें हैं. ऐसा सोचना बहुमूल्य समय की बेवजह बर्वादी है.  ऐसे वक्त दोस्त को फ़ोन करना नाइंसाफी  से कम नहीं.  ऐसे में अपना  मोबाइल बंद कर लें तो उत्तम, नहीं तो कम से कम साइलेंट मोड पर जरूर कर लें.  फेस बुक आदि से इस समय दूर ही रहें तो अच्छा. बस खुद पर और परीक्षा की अपनी तैयारी  पर ध्यान केन्द्रित करें.

अंत में एक छोटी-सी बात और.  परीक्षा के दौरान  “टेक-इट-इजी”  सिद्धांत को फॉलो करें. इस सिद्धांत के तहत प्रश्नों को पहले ठीक से पढ़ना, समझना और फिर उत्तर देना चाहिए.  इस अवसर पर ‘स्मार्ट समय प्रबंधन’ आपके परफॉरमेंस और परीक्षाफल को बेहतर बनाता है.      (hellomilansinha@gmail.com)

                                         ...फिर मिलेंगे, बातें करेंगे - खुले मन से ... ...
   
#लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 20 जनवरी, 2019 अंक में प्रकाशित 
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com  

Friday, January 18, 2019

Stress Management - The New Life Scenario

                                                     - MILAN K SINHA
Only change is permanent in life – it has been the cardinal truth for centuries. May be the pace of change vary from time to time, place to place, country to country and from person to person. But, change takes place day in and day out. It being so, there is no denying the fact that the world is changing and also changing fast - socially, economically, technologically, politically and culturally, and so is our country. The pace of this change has been faster in corporate world with the advent of the famous concept of LPG -Liberalization, Privatization and Globalization.

Now, if change is the main variable in our life, accepting and accordingly adapting to the changes to keep us going and enjoying life is very essential. It is more so for individuals who try to build up a big business empire or to go up in career path very fast. In fact, failure to manage change results in worries, tension and stress which as per several findings of medical research have  also been the reasons for heart, kidney and liver problems – in number of cases even in early thirties itself. 

Its common knowledge that over the last couple of years, value system in our society has undergone changes more for worse; in corporate world, it has generally collapsed. Young professionals seeking remedy for maladies like stress and depression talk straight and simple against the compelling work environment being created purposefully for achieving, at times even seemingly unachievable, business targets more by crook than by hook. Unfortunately, this is becoming the order of the day in many companies, more noticeably in Indian IT as well as Financial Sectors.

Yes, the level of uncertainty, tension and stress has been going up, everyone agrees, if not talk openly. And almost in the same proportion the level of joy, happiness and comfort has been going down despite the much talked about GDP growth story of our country.  But, except visiting a doctor and taking sleeping pills, is there any easy and doable solution to correct the situation to begin with? Can effecting a change in our lifestyle, behavior pattern and thought process help in this regard? 

Definitely, there are a few we can discuss here.

The first thing we should do is to avoid imitating others blindly. Making our life a copy-paste version will not lead us to a happy and contented life. On the contrary, we should sincerely try to know ourselves. And, in turn, find ourselves and be ourselves always endeavoring for further improvement in one’s personality by positive thoughts, actions and engagements on an ongoing basis.
Instead of being submissive or aggressive in one’s behavior, it is desirable to be assertive since assertive behavior encompasses the qualities of being confident, mature, frank, balanced, objective, dynamic, decisive, competent, humorous, relaxed and logical. The assertive attitude must be backed by an honest, transparent, and committed action.

Physical fitness is necessary in order to stay mentally healthy as well. What affects our body affects our mind and vice-versa. Eating healthy and sleeping well are therefore, very necessary as engaging oneself in regular physical exercise including walking. Spending quality time with family, more particularly with children and elderly ones is equally important.
Generally speaking, the human tendency, you will agree, has been to think and worry about what we haven’t rather than think what we have, even though; generally many of the things in our lives are right. In fact, we have been in the habit of counting our curses and not the blessings. Undoubtedly, this is the greatest tragedy and it has probably caused more misery than all the wars and diseases in the history. Contrary to this kind of psychology, if we tend to practice ‘Think and Thank’ philosophy in our day to day life, we can have the feeling of wellness in abundance. 

Practicing ancient relaxation techniques like YOGA, MEDITATION & PRAYER needs no extra emphasis in today’s fast and relatively complex life. Yoga is not an exercise but it is a way of life. Yoga actually means the experience of oneness or unity with your inner being. Meditation, sitting still, alone with our thoughts and feelings, usually has a very soothing effect both on our body and mind. And many of us know that our greatest power lies in the power of prayer.

So, then why not start enjoying the fruits of conscious living instead of casual living we normally live knowingly or unknowingly and complaining against its negative outcomes. It would definitely change our whole perspective towards life which is so precious to be experienced and enjoyed.
           Will meet again with Open MindAll The Best.